रविवार, 27 जनवरी 2019
दुनिया के अन्य देशों में गणतंत्र दिवस
मंगलवार, 15 जनवरी 2019
सतजुगी डकैती (हास्य)
नयी जगह थी, नया बाजार लेकिन हाथ में थमी सामानों की लंबी लिस्ट को छोटा कराने किसी न किसी दुकान में तो जाना ही था सो एक लाला जी की भरी-पूरी हाट में जा घुसा। ग्राहक तो कोई नहीं था वहाँ लेकिन वे महाशय किसी से फोन से बतियाने में भयंकर रूप से लीन थे। मैंने इधर-उधर ताक-झाँक के थोड़ा टाइम काटा लेकिन वे फोन छोड़ने को तैयार हों तब तो! अब हमारा भी ध्यान गया कि आखिर किससे इतना प्यार जता रहे? वो भी इस तरह से
"अरे हाँ-हाँ भाई, अभी पिछले दिनों बहुत बिक्री हुई। पूरे पाँच लाख की। आप आइए तो सही। आपके बच्चे मेरे बच्चे जैसे हैं। अब कोई बहाना नहीं चलेगा, बस। हँ...हाँ पाँच मिनट में आप यहाँ होने चाहिए मेरे सामने, चलिए आइए सब लोगों के साथ"
इतना कह के उन्होंने फोन काटा और हमारी ओर सरसरी नजर मार के बोले
"कहिए हुजूर, क्या सेवा करें आपकी"
मैंने अपनी लिस्ट पकड़ा दी। नौकर को लिस्ट देकर वे अपने गल्ले में रखे रुपयों का हिसाब-किताब करने लगे। लिस्ट भारी-भरकम होने के कारण कुछ समय तो लगना ही था कि इतने में एक कार बाहर रुकी और उसमें से एकदम सांबा के जैसा एक आदमी निकला। मैं हैरान कि ये कौन आया? तभी उसके पीछे दो-चार कालिये भी निकल आये। लाला जी उनको देखते ही खड़े हो गये हाथ जोड़ के। भाव बिल्कुल वही जो समधी, दामाद टाइप रिश्तेदारों के आने पर होता है। सबसे अंत में एक सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व कार से बाहर अवतरित हुआ। कहने की जरूरत नहीं कि वो फुल्टु गब्बर का ही अपडेटेड वर्सन था लेकिन उन सभी के चेहरों पर गजब की सौम्यता थी जो चीख-चीख के कह रही थी कि हम दया के सागर हैं सो मुझे कोई खतरा आया महसूस नहीं हो रहा था। सब के सब अंदर दाखिल हुए। लाला जी ने उसे जल्दी से गले लगा लिया।
मुकदमा (अतुकांत)
मुकदमा "मैं" बनाम "हम" का
अंतस की अदालत में
दायर हो गया था
बचपन की विदाई के साथ ही
"मैं" की बढ़त ताकत देती है पंखों को
"हम" की प्रबलता ले लेती कुछ अंश
अंबर के लिए कर के रूप में
अंबर को मना भी नहीं कर सकते!
कितने ही खनकते पल
खर्च होते गये इस विवाद में अब तक
अनिर्णय का अट्टहास डरा रहा है
पाँवों के छालों का दायरा बढ़ा रहा है
अंतस की अदालत में
दायर हो गया था
बचपन की विदाई के साथ ही
"मैं" की बढ़त ताकत देती है पंखों को
"हम" की प्रबलता ले लेती कुछ अंश
अंबर के लिए कर के रूप में
अंबर को मना भी नहीं कर सकते!
कितने ही खनकते पल
खर्च होते गये इस विवाद में अब तक
अनिर्णय का अट्टहास डरा रहा है
पाँवों के छालों का दायरा बढ़ा रहा है
समझदार गिलहरी (बाल कविता)
लकी गिलहरी लेकर आयी, बोरी भर अखरोट
देख चतुर खरहे के मन में, आया थोड़ा खोट
अखरोटों को पाने खातिर, सोचा एक उपाय
दौड़ लकी के पास गया और बोला - सिस्टर हाय!
बोरी मुझको दे दे, तेरा घर है काफी दूर
छोटी सी तू, हो जाएगी थककर बिल्कुल चूर
चतुर सोचता था कि बोरी आते अपने हाथ
भाग चलूँगा सरपट मैं तो छोड़ लकी का साथ
मगर लकी भी होशियार थी, समझ गयी सब खेल
कर डाली उसने खरहे की तुरंत योजना फेल
मकर संक्रांति पर उड़ाओ स्मार्टफोन में पतंग
गुरुवार, 10 जनवरी 2019
सोमवार, 7 जनवरी 2019
नया वर्ष लगा चमकने (गीत)
नया वर्ष है लगा चमकने
देखो वातायन से
आशाओं की ज्योति जगाने
हवा हुलसती फिरती
इच्छाओं की नौका
नयनों के दर्पण में तिरती
ढाई अक्षर भी मदमाते
सभी ओर तन-मन से
कलरव का मौसम ये न्यारा
हृदय-हृदय को भाए
गोद युगल की पाते झूमे
झूम-झूम इठलाए
उत्सव आया नव विहान का
अंबर के आँगन से
देखो वातायन से
आशाओं की ज्योति जगाने
हवा हुलसती फिरती
इच्छाओं की नौका
नयनों के दर्पण में तिरती
ढाई अक्षर भी मदमाते
सभी ओर तन-मन से
कलरव का मौसम ये न्यारा
हृदय-हृदय को भाए
गोद युगल की पाते झूमे
झूम-झूम इठलाए
उत्सव आया नव विहान का
अंबर के आँगन से
वो कौन थी? (कहानी)
“दीदी, मैं स्कूल के लिए निकल रही हूँ...”
सुहानी ने बड़ी बहन सोनाली से कहा और सीढियों से नीचे उतर आयी. उसका पति राकेश
घर के आगे वाले कमरे में बैठकर कोई किताब पढ़ रहा था. उसका ध्यान किताब से बाहर आया तो उसने दूर से ही कह दिया,
“हाँ...तुम जाओ...मेरे भी
स्टूडेंट्स आते होंगे” सुहानी
मुस्कुराती हुई वहाँ से चली गयी.
उनलोगों की यही दिनचर्या थी. सुहानी निजी विद्यालय की शिक्षिका थी. वो अपने स्कूल चली जाती और राकेश कोचिंग क्लासेज में व्यस्त
रहता. क्लासेज की पूरी व्यवस्था उसने घर के अगले कमरे में ही कर रखी थी. राकेश
के माँ-बाप इन दिनों महीने भर के लिए अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गये हुए थे.
उधर, बालकनी में खड़ी सोनाली, सुहानी को बाय कर रही थी. सुहानी की शादी के बाद पहली बार वो उसके ससुराल आयी थी और बहन को खुश देख उसका मन खिल उठा था. सुहानी ने जब घर में राकेश के बारे में
बताया तो पहलीबार में सबने गुस्सा ही जाहिर किया था. पापा तो संभवतः और मुखर
विरोध करते लेकिन बाद में मम्मी ने बेटी की खुशी की खातिर समझा-बुझाकर उन्हें मना लिया. सोनाली को भी सुहानी के प्रेम विवाह से कोई आपत्ति नहीं थी. उसे दिक्कत थी तो केवल उसकी
जल्दबाजी से. राकेश से मिलने के बस छः-सात महीनों के अन्दर सुहानी ने उससे शादी की
रट पकड़ ली थी.
नौ बजने को आ गये. सोनाली को चाय की तलब लगी. वो नीचे आयी. राकेश विद्यार्थियों के बीच मगन था. सोनाली ने उससे चाय के लिए पूछा और फिर किचन में चली गयी.
लौटी तो देखा कि वो क्लास से अलग, पास वाले कमरे में किसी से फोन पर बात कर रहा था. सोनाली को देखकर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी और हँसकर बोला,
“वाह दीदी! आपने कितनी जल्दी बना ली...मैं तो पत्ती, दूध ही खोजता रहता इतनी देर...”
चाय देकर सोनाली फिर ऊपर चली गयी. टीवी देखते-देखते कैसे बारह बज गये, पता ही नहीं चला. घड़ी
पर नजर गयी तो जल्दी से उठी. सुहानी के भी आने का समय हो चला था. वो किचन में चली गयी.
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