बाल रचना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बाल रचना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

Write a Letter Appreciation Week (01-07 March 2021)


 बच्चों, Write a Letter Appreciation Week इस वर्ष एक मार्च से सात मार्च तक मनाया जाएगा। वर्ष 2011 से दुनियाभर में इसका चलन लोकप्रिय होने लगा। सोशल मीडिया और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी (एसएमएस, ई-मेल्स आदि) के चलते हस्तलिखित पत्रों का उपयोग कम होने लगा है। इसी को देखते हुए लोगों ने हाथ से चिट्ठी लिखने की परंपरा को प्रोत्साहित करने के लिए Letter Appreciation Week का आयोजन शुरू किया। इस दौरान हम उन लोगों को अपने हाथ से लिखी चिट्ठियाँ, नोट्स भेजते हैं, जिन्होंने हमको प्रेरित किया है। जैसे हमारे पेरेंट्स, टीचर्स या कोई बेस्ट फ्रेंड। 


चिट्ठियों का वो जमाना


एक समय था जब लोग पोस्टमैन को देखते ही उसके पास जाते थे। पूछा जाने लगता था कि क्या मेरी भी कोई चिट्ठी आयी है? समय बदला और कंप्यूटर-मोबाइल ने एक-दूसरे से बात करना बेहद आसान बना दिया। ये बढ़ते समय के साथ अच्छा भी है लेकिन हाथ से लिखी गयी चिट्ठियों की बात ही अलग होती है। पहले जब कोई चिट्ठी आती थी तो उसके शब्दों को पढ़कर ऐसा लगता था जैसे लिखने वाला खुद ही उन अक्षरों के साथ कागज की नाव में बैठकर हमारे पास आ गया है।


हाथ से चिट्ठी लिखने के कई लाभ



तुम अभी स्टूडेंट्स हो और परीक्षा में तुमको लेटर राइटिंग भी करनी होती है। जो बच्चा जितने अच्छे से लिखता है, उसको उतने ही बढ़िया मार्क्स मिलते हैं। हाथ से चिट्ठी लिखने से तुम्हारी हैंडराइटिंग भी अच्छी होगी और सोचने की शक्ति का विकास होगा। अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए तुम कितने सुंदर शब्द सोच सकते हो, यह भी पता चल जाएगा। इसके अलावा हाथ से लिखते समय मोबाइल के ऑटो करेक्ट जैसी सुविधा नहीं मिलती, जिससे लिखने वाले को स्वयं ग्रामर आदि का ध्यान रखना पड़ता है। इससे शुद्ध लेखन की आदत बनी रहती है। एक विशेष बात और कि तुम सबने कर्सिव राइटिंग तो देखी ही होगी? कितनी खूबसूरत लगती है न! तो तुम भी इसबार कर्सिव राइटिंग में ही अपना लेटर लिखने का प्रयास करो। ये तुमको तथा पत्र पढ़ने वाले, दोनों को खुश कर देगा।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

अनोखे साँपों की खूबसूरत दुनिया

हमारी प्रकृति में कई तरह के जीव-जंतु पाए जाते हैं और साँप उनमें से ही एक हैं। साँप दुनिया भर में लगभग सभी जगहों पर पाए जाते हैं जिनमें अधिकतर जहरीले होते हैं। यही कारण है कि इनके प्रति लोगों के मन में एक स्वाभाविक डर होता है। आओ, आज तुमको बताते हैं इन्हीं सर्पों की कुछ अनोखी प्रजातियों के बारे में जिन्हें देख कर तुम्हें आश्चर्य भी होगा और रोमांच भी! लेकिन यह ध्यान रखना कि इनमें से कई अत्यधिक विषैले होते हैं।


रेनबो स्नेक



हम सब ने कभी ना कभी बारिश के मौसम में इंद्रधनुष देखा है। तुमको जानकर हैरानी होगी लेकिन इंद्रधनुषी रंगो वाले साँप भी होते हैं। हाँ, यह दुर्लभ होते हैं। अमेरिका के फ्लोरिडा में हाल ही में इनको देखा गया था। ऐसा 50 सालों के बाद हुआ। इनकी पीठ नीले और काले रंग की होती है और झिलमिल दिखती है। इनके शरीर पर चमकदार लाल पीली धारियां भी होती है। यह 100 से 140 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। इन्हें जहरीला नहीं माना गया है और ये  बहुत शर्मीले होते हैं। यह जलीय इलाकों के पास छुप कर रहना पसंद करते हैं। 


एमराल्ड ट्री बोआ



एमराल्ड ट्री बोआ, ब्राजील के वर्षा वन में पाए जाने वाले साँपों की दुर्लभ प्रजातियों में से एक हैं और यह हरे रंग के बहुत खूबसूरत साँप होते हैं। इनके शरीर पर सफेद रंग के स्पॉट्स होते हैं और निचला हिस्सा पीले रंग का होता है। किताबी भाषा से हट के बात करें तो इनका शरीर काफी हद तक परवल की मिठाई के रंग का होता है। इनकी लंबाई 2.2 मीटर तक हो सकती है और वजन लगभग 2 से 4 पाउंड का होता है। इनके दांत बड़े होते हैं लेकिन इनको भी जहरीला नहीं माना गया है। दिन में पेड़ों पर रहकर, रात को यह शिकार करने बाहर आते हैं। इनकी विशेषता ये भी है कि अन्य सर्प प्रजातियों की तरह इनकी मादा अंडे नहीं देती बल्कि बच्चों को अपने अंदर ही विकसित कर के जन्म देती है।


अल्बाइनो स्नेक



साँपों का नाम सुनते ही काले, धूसर रंग के किसी साँप की कल्पना होने लगती है लेकिन यह साँप सफेद होता है। इनकी आंखें गुलाबी रंग की होती है और यह बहुत सुंदर दिखते हैं। यह ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। इनके बारे में रोचक बात यह है कि जब यह अंडे से बाहर आते हैं तो कई रंगों में होते हैं और जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती है, इनका रंग हल्का पड़ता चला जाता है और एक समय पूरे सफेद हो जाते हैं। इनकी लंबाई 8 फुट तक हो सकती है। यह बहुत जहरीले होते हैं लेकिन आत्मरक्षा में ही किसी को काटते हैं।

अजब-अनोखे बंदर (मंकी डे विशेष)

14 दिसंबर को मंकी डे मनाने के चलन सन 2000 से चला आ रहा है। हालाँकि ये संयुक्त राष्ट्र से घोषित दिवस नहीं है लेकिन निरीह जानवरों के प्रति प्यार दर्शाने की भावना से सैंकडों देश इसमें भागीदारी करते हैं। दुनिया भर के चिड़ियाघरों के साथ-साथ कई जगह बंदरों से जुड़े कार्यक्रम रखे जाते हैं। भारत में भी इस अवसर पर विभिन्न जगहों पर बच्चों के लिए कई कार्यक्रम होते हैं, जिनमें उन्हें जंगल और उसके जानवरों के बारे में बताया जाता है। इसे शुरू करने का श्रेय कैसे सॉरो और एरिक मिलीकिन को जाता है। एक दिन जब कैसे सॉरो पढ़ रहे थे तब उन्होंने अपने दोस्त के यहां टंगे कैलेंडर में 14 तारीख पर मंकी डे की चिट लगा दी जिसे बाद में सब दोस्तों ने सचमुच सेलिब्रेट किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सब मंकी डे को प्रमोट करने में जुट गए। बंदरों की पेन्टिंग्स बनाकर लोगों को दिखाना और जागरुक करना शुरू किया। वैसे तो हम सब ने अपने आसपास कईबार बंदरों को देखा है किन्तु आज हम तुम्हें बता रहे हैं बंदरों की कुछ बेहद अनोखी प्रजातियों के बारे में।


मूँछों वाला बंदर एम्पेरर टामरिन


इसके चेहरे पर सफेद, लंबी मूँछें होती हैं जो कि लटकती रहती हैं। इसका शरीर रोएँदार, धूसर रंग का होता है। इस बंदर का आकार 9–10 इंच का होता है लेकिन इसकी पूँछ 13.8–16.3 इंच की लंबाई तक पहुँच जाती हैं यानी इसकी पूँछ इससे भी लंबी होती है। ये जीव मूल रूप से दक्षिण-पश्चिम अमेजन घाटी में पाया जाता है और इससे लगते पेरू, ब्राजील और बोलिविया के कुछ इलाकों तक भी देखने को मिलता है। भोजन की बात करें तो ये मुख्यतः फल खाने वाले होते हैं लेकिन जरूरत होने पर कीड़े, शहद और पत्तियाँ भी खा लेता है। मादा टामरिन 140-145 दिनों की गर्भावधि के बाद शिशु टामरिन को जन्म देती है। एम्पेरर टामरिन का जीवनकाल 10 से 20 वर्षों का होता है।


गोल्डन लायन टैमरिन


जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि ये बंदर देखने में काफी हद तक शेर जैसा लगता है किन्तु आकार में बहुत छोटा है। लगभग 7.5 से 8.75 इंच का इसका शरीर 10.25 से 13.5 इंच लंबी पूँछ वाला होता है। इनकी औसत आयु 15 वर्ष मानी जाती है। ये मूलतः ब्राजील से हैं। मजेदार बात ये कि ये हर रोज एक नयी मांद में सोते हैं। सुबह के नाश्ते में फल और दोपहर के खाने में कीड़ों को पसंद करते हैं। जंगलों को काटे जाने से इनका अस्तित्व संकट में है। 


गिलहरी बंदर



स्क्विरेल मंकी या गिलहरी बंदर मध्य और दक्षिणी अमेरिका में मिलता है। इनको समूहों में रहना पसंद होता है। हर समूह में लगभग पाँच सौ सदस्य होते हैं। ये देखने में थोड़ा-थोड़ा गिलहरी सा लगता है। इनके सदस्य सुरक्षा के लिए खास तरह की आवाजें निकाल कर अपने साथियों को सचेत कर देते हैं। विशेषकर जब बाजों का हमला हो तब। कीड़े और फल इनका मुख्य भोजन हैं। ये 25 से 35 सेंटीमीटर तक लंबे हो सकते हैं। इनकी भी पूँछ इनसे लंबी यानि लगभग 35 से 42 सेंटीमीटर की होती है। पूँछ का उपयोग ये पेड़ों पर चढ़ने-उछलने के समय अपना बैलेंस बनाए रखने में करते हैं।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

चिंकू कबूतर और कागू कौआ (बाल कहानी)

 

दीपावली करीब थी सो चिंकू कबूतर, आम के पेड़ पर बने अपने घर की पेंट-पुताई में लगा था। उसने एक मोटी डाल पर अपनी मेहनत से छोटा सा, प्यारा और बहुत सुंदर घर बना रखा था। साथ में उसकी पत्नी मिंकी और बेटा गुटरू रहते थे। मिंकी चुनकर लाए दाल-चावल के दाने जमा कर रही थी और गुटरू पास की डाली पर अपने दोस्तों के साथ फुदक -फुदक कर दीपावली में खरीदे जाने वाले पटाखों और मिठाइयों की प्लानिंग कर रहा था।

 

तभी अचानक चिंकू को अपने घर पर पड़ती बड़ी-बड़ी परछाइयाँ दिखाई दीं! घबराकर चिंकू ने पीछे देखा तो वन के दो नामी बदमाश बाज टिगारा और सिंहारा उनके पेड़ के चारों ओर गोल-गोल चक्कर काटते उड़ रहे थे। उनकी आँखों में हमेशा की तरह क्रूरता भरी थी। उनका काम ही था दूसरों को परेशान करना और खाना छीनना!

 

उनके कुछ समझ पाने से पहले ही टिगारा ने गुटरू की ओर झपट्टा मारा। गुटरू बेचारा डर से अपनी जगह पर जड़ हो गया। टिगारा उसे अपने पंजों में जकड़ने ही वाला था कि मिंकी गोता लगाकर गुटरू को ले उड़ी। गुटरू के दोस्त चिल्लाते हुए वहाँ से भाग गये। टिगारा का हमला निष्फल गया। सिंहारा ने उनके घर की ओर आक्रमण किया। चिंकू ने पेंट ब्रश और बाल्टी उसे मारी लेकिन कोई खास असर नहीं हुआ। सिंहारा के पंजे से खुद को तो उसने बगल में छलाँग लगाकर बचा लिया लेकिन घर का दरवाजा नहीं बच सका।

 

रविवार, 14 जुलाई 2019

चालाक चूहा (बाल कविता)


(और अधिक जूम इन करने के लिए फोटो पर क्लिक करें)

शनिवार, 11 मई 2019

परोपकार की शक्ति (बाल कहानी)

शौर्यपुर का राजकुमार अचल वन विहार कर रहा था कि तभी उसकी दृष्टि एक रोते हुए बुजुर्ग पर पड़ी जिसे कुछ लोग पीट रहे थे। अचल तुरंत वहाँ पहुँचा और कड़क के पूछा।

"कौन हो तुमलोग और इनको क्यों मार रहे?"

अचल को देखते ही वे लोग वहाँ से भाग निकले। अचल उनका पीछा करना चाहता था लेकिन बुजुर्ग को सम्हालना उसने ज्यादा जरूरी समझा।

"आप इस जंगल में क्या कर रहे थे?"

"घर जा रहा था बेटा, सोचा इस जंगल के रास्ते जल्दी पहुँच जाऊँगा लेकिन ये लुटेरे मिल गये" बुजुर्ग ने रोते हुए कहा। अचल ने उनका बिखरा सामान समेट के थैली मे रखा और अपने कंधे पर रखा।

"मैं यहाँ का राजकुमार अचल हूँ, चलिए आपको वैद्य जी से दिखा दूँ"

महल पहुँचकर अचल ने बुजुर्ग को वैद्य से दिखाया। वैद्य ने कुछ दवाएँ दी और पट्टियाँ बाँधी। दो दिनों तक अचल ने राजकीय खर्च से उनका इलाज कराया। उसने उनके घरवालों को भी बुलवा लिया था। बुजुर्ग के इस संसार में केवल एक पोता और एक पोती थी। जब उनकी तबीयत सुधरी और वे घर जाने लगे तो उन्होंने अचल से कहा।

"बेटा, तुमको देने के लिए मेरे पास..."

"अरे नहीं बाबा" अचल ने उनके हाथ पकड़ के कहा। "मुझे कुछ नहीं चाहिए, आप मेरी प्रजा हैं, आपकी सेवा मेरा कर्तव्य"

"बेटा, ये तो तुम्हारा बड़प्पन है, तुम भी मेरे पोते जैसे हो, लो ये रख लो, मैं अपने पोते के लिए ही ले जा रहा था"

कहते हु्ए बुजुर्ग ने अपनी थैली से एक पासा निकाला और अचल को दिया। अचल ने बुजुर्ग का दिल रखने के लिए उसे मुस्कुरा के स्वीकार कर लिया। बुजुर्ग उसको आशीर्वाद देते हुए अपने परिवार के साथ चले गये।

अचल अपने कक्ष में आकर ऐसे ही खेल-खेल में उस पासे को चलने लगा। वह जब भी चलता हर बार छः आता। उसे ये देख हँसी आने लगी। तभी उसके मंत्री ने सूचना दी कि कोई घोड़े का व्यापारी बहुत अच्छे घोड़े लेकर आया है और महाराज चाहते हैं कि राजकुमार भी कोई एक घोड़ा अपने लिए खरीद लें। अचल घोड़े देखने निकल पड़ा। व्यापारी ने उसे घोड़े दिखाने शुरू किये। सचमुच सभी घोड़े एक से बढ़कर एक थे। अचल निर्णय नहीं ले पा रहा था। उसी समय उसकी नजर एक घोड़े की लगाम पर गयी। उस पर छः लिखा लॉकेट बँधा था। अचल ने यों ही सोचा कि पासे में भी छः आ रहा था, चलो यही घोड़ा ले लेता हूँ। उसने वही घोड़ा खरीद लिया। बाकी घोड़े सेनापति, मंत्री और सिपाहियों ने खरीद लिये। सचमुच अचल का घोड़ा उन सबमें बढ़िया निकला। ऐसा सरपट भागता कि सब देखते रह जाते। छलाँग ऐसी कि कंगारू भी शरमा जाए। अचल अपने घोड़े से पूरा संतुष्ट था।

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

रविवार, 7 अप्रैल 2019

समझ गई रावी (बाल कहानी)

रावी आज फिर खाना खाते समय मुँह-नाक सिकोड़ रही थी।

"हुँह, मम्मी, यह कितनी बेकार सी दाल बनाई है और रोटी कच्ची लग रही है..."

मम्मी जानती थीं कि न दाल में कोई खराबी है और न ही रोटी में। गड़बड़ है तो बस रावी का स्वभाव। हर बात में गुस्सा, चिड़-चिड़ करते रहना, सो उन्होंने उसे समझाया,

"आज खा ले बेटी, शाम के खाने में तेरे पसंद की सत्तू भरी कचौरी बना दूँगी"

रावी खुश हो गयी लेकिन नखरे तो दिखाने ही थे इसलिए चुपचाप नाक फुलाकर खाने लगी। वह हमेशा ऐसे ही करती थी। बिना बात के किच-किच। पापा उसे समझाने लगते तो मम्मी कहतीं कि अभी बारह साल की तो है। बड़ी होगी तो खुद समझने लगेगी।

शाम को आसमान में काले बादल घिरने लगे। मम्मी छत पर सूख चुके कपड़े उतारने भागीं कि कहीं बारिश हो गयी तो भीग जाएँगे! रावी भी छत पर आकर ठंडी हवाओं के मजे लेने लगी। मम्मी, तार पर टँगे कपड़े उतार रही थीं कि तभी नीचे से गुजर रहे एक ट्रक ने उनके घर के बिल्कुल पास वाले बिजली के खंभे में जोर की टक्कर मार दी। धमाके सी आवाज हुई और खंभा मुड़कर उनके घर की ओर झुक गया। मम्मी चौंक उठीं लेकिन उनके कुछ समझ पाने से पहले ही खंभे के तारों में से दो तार टूटकर उनकी ही ओर उछल कर गिरने लगे।

"आऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ" मम्मी की चीख निकल गयी, रावी का भी कलेजा मुँह को आ गया। वह चिल्लाई, "मम्मीऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ"

मम्मी के पैर घबराहट के मारे अकड़ गये और दोनों तार उनके ठीक आसपास आकर गिर गये। उनसे तड़तड़ाहट की आवाज आ रही थी, मतलब कि उनमें बिजली सप्लाई चालू थी। अच्छी बात ये हुई कि उनमें से किसी ने भी मम्मी को छुआ नहीं वर्ना बहुत बड़ा संकट आ सकता था। रोती हुई रावी दौड़कर मम्मी से लिपट गयी।

गुरुवार, 7 मार्च 2019

बकरापुर की होली (बाल कविता)


होली के दिन बकरापुर में, शेर घुसे गुर्राते
भाग घरों में दुबके बकरे, अपनी जान बचाते

छूट गये उनके हाथों से गुब्बारे, पिचकारी
पड़ा रंग में भंग, हाय! आयी ये आफत भारी


गली-गली में लगी घूमने शेरों की वह टोली
"कब तक खैर मनाऊँ बेटे!" बकरे की माँ बोली

देख रही थी सबकुछ डाली पर बैठी गौरैया
उसने विनती की शेरों से - मेरे प्यारे भैया


इन बेचारों के उत्सव को शोक बना मत डालो
पशु-पशु भाई-भाई होते, सबको गले लगा लो

शेर ठठाकर हँसा और बोला - गौरैया बहना
डरना हमसे छोड़ सुनो क्या है हम सब का कहना


नहीं किसी को खाने आयी यहाँ हमारी टोली
आज खेलने आये हैं हम तुम सब के संग होली

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

देस अजूबा (बाल कहानी)

दस्युराज शुंबला का आतंक कई राज्यों में था। अच्छे-अच्छे राजा भी उससे भय खाते। पाँच हजार खूंखार डाकुओं से सजी उसकी सेना कहाँ से आती और भारी लूटपाट मचा के किधर गायब हो जाती, किसी को पता नहीं चल पाता। उसके गुप्तचर वेश बदलकर जगह-जगह जाकर जानकारी इकट्ठी करते कि कहाँ-कहाँ से ज्यादा माल हाथ लग सकता!

इसी क्रम में एक बार उसके गुप्तचर किसी द्वीप पर पहुँचे। वहाँ की संपन्नता देख उनकी आँखें चौंधिया गयीं। कहीं एक रुपये में एक बड़े गिलास मलाईवाला दूध मिल रहा था तो कहीं पाँच रुपयों में पनीर पुलाव की थाली। ऊँचे-ऊँचे सुंदर घर और गहनों से लदी नारियाँ। स्वर्णमुद्राओं से भरी थैलियाँ यों ही निश्चिंतता से लेकर घूमते पुरुष। एक गुप्तचर ने उस जगह का नाम किसी व्यक्ति से पूछा,

"भाई, हम यात्री हैं, दूर से आये हैं, आपके इस देश का नाम क्या है?"

व्यक्ति मुस्कुराया और बोला,

"ये देस अजूबा है भाई, आपका यहाँ स्वागत है, आप उस सामने वाली धर्मशाला में चले जाइए, आप सबके जलपान और विश्राम का वहाँ निःशुल्क प्रबंध हो जाएगा"

गुप्तचर धर्मशाला में गये। सचमुच वहाँ बहुत अच्छी व्यवस्था थी। वहाँ के मालिक ने बताया,

"हम बाहर से आनेवाले यात्रियों के लिए सदा-सदा से ऐसी ही व्यवस्था करते आये हैं, यह हमारी परंपरा है"

गुप्तचर डाकू चकित थे। उन्होंने अगले दिन धर्मशाला मालिक से देस अजूबा के राजा का नाम पूछा,

मालिक बोला,

"भई, ये देस अजूबा है, यहाँ का कोई राजा नहीं"

गुप्तचरों का तो दिमाग ही इस बात से घूम गया। वे वहाँ से निकल गये। उन्होंने पूरे द्वीप पर भ्रमण किया। वहाँ एक भी सैनिक उन्हें नहीं दिखा और न ही कोई कारागार। पूछने पर एक नागरिक बोला,

"यहाँ कोई सैनिक नहीं और न ही जेल, आमतौर पर यहाँ अपराध नहीं होते"

गुप्तचरों का मन तो झूम उठा। इतना संपन्न राज्य और न कोई राजा न सैनिक! एक कारागार तक नहीं! मूर्ख हैं, मूर्ख हैं ये सारे लोग जो अब हमारे हाथों लुटेंगे और इनकी रक्षा करने भी कोई नहीं आएगा।

उन्होंने लौटकर शुंबला को यह अच्छा समाचार दिया। शुंबला भी खुशी से उछल पड़ा। उसने गुप्तचरों को मोतियों की माला भेंट की। अगले ही दिन उसकी खूंखार सेना देस अजूबा पर हमले को कूच कर गयी।

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

समझदार गिलहरी (बाल कविता)


















लकी गिलहरी लेकर आयी, बोरी भर अखरोट
देख चतुर खरहे के मन में, आया थोड़ा खोट

अखरोटों को पाने खातिर, सोचा एक उपाय
दौड़ लकी के पास गया और बोला - सिस्टर हाय!

बोरी मुझको दे दे, तेरा घर है काफी दूर
छोटी सी तू, हो जाएगी थककर बिल्कुल चूर

चतुर सोचता था कि बोरी आते अपने हाथ
भाग चलूँगा सरपट मैं तो छोड़ लकी का साथ

मगर लकी भी होशियार थी, समझ गयी सब खेल
कर डाली उसने खरहे की तुरंत योजना फेल

पहेलियाँ बूझिए






































(और अधिक जूम इन करने के लिए फोटो पर क्लिक करें)

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

पहेली का हल (बाल कहानी)


एकबार एक राजा अपने राज्य के जंगल वाले इलाके से होकर गुजर रहा था. अचानक उसके सामने शेर आ गया. राजा का घोड़ा शेर के डर से अनियंत्रित होने लगा. राजा ने अपनेआप को सम्हालने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह घोड़े से गिर ही पड़ा. उसकी तलवार छिटक के उससे दूर हो गयी. शेर गुर्राता हुआ राजा के और निकट आ गया.

राजा को अपनी मृत्यु दिखाई देने लगी थी मगर उसी समय एक आदिवासी युवक जलती हुई मशाल लेकर शेर और राजा के बीच कूद पड़ा. जंगली जानवरों को आग से भय होता है. वह शेर भी आग देखते ही पीछे हटने लगा. उस आदिवासी युवक ने बहुत ही बहादुरी से ललकारते हुए उस शेर को भगा दिया.

राजा ने चैन की साँस ली. उसने उस युवक से उसका परिचय माँगा. युवक ने अपना नाम कर्मा बताया और बोला कि वह यहीं पास में रहता है. घर में उसके अलावा उसकी बूढ़ी माँ, जवान बीवी और एक बेटा है. बेटा अभी बालक है. रोज की तरह आज भी कस्बे के ढाबे से परिवार के लिए खाना लेने जा रहा था परन्तु शेर और घोड़े की आवाजें सुनकर यहाँ चला आया कि कहीं कोई संकट में तो नहीं?

राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ. उसने तुरंत अपनी कमर में बंधी स्वर्ण मुद्राओं की पोटली से इक्कीस स्वर्णमुद्राएँ निकालीं और और कर्मा को देते हुए बोला,

“कर्मा, ये लो तुम्हारा पारितोषिक...हम तुमसे बहुत खुश हैं”

कर्मा ने राजा को प्रणाम किया और एक स्वर्णमुद्रा उसे वापस करते हुए कहा,

“महाराज, मैं बीस स्वर्णमुद्राएँ ही लेना चाहता हूँ...यह एक स्वर्णमुद्रा आप मेरी ओर से किसी और निर्धन को दे दीजिएगा”

“ऐसा क्यों भई?” राजा ने उससे कारण पूछा. कर्मा मुस्कुराकर कहने लगा,

“महाराज, मुझे हिसाब करने में सुविधा रहेगी”

रविवार, 16 दिसंबर 2018

दिवु की अनोखी बीमारी (बाल कहानी)

दिवु गिलहरी उदास सी बैठी थी. उसके दोस्त मक्कू चूहे ने कारण पूछा तो उसने बताया,

“मुझे कभी-कभी दिखना बंद हो जाता है...कुछ भी नहीं दिखता उस समय”

“ओह्हो” मक्कू परेशान स्वर में बोला, “चल आज शाम ही तुझे डॉक्टर के पास ले चलता हूँ”

शाम को दोनों आँखों के डॉक्टर मटरू हाथी के क्लिनिक में पहुँचे. मटरू ने दिवु की आँखों की जाँच की. अक्षर भी पढ़वा के देखे. उसे कोई गड़बड़ी नहीं मिली. उसने मक्कू से कहा,

“ये गिलहरी तो सब सही-सही पढ़ रही है! और आँखों में भी कोई प्रॉब्लम नहीं है! खैर...मैं कुछ दवाएँ लिख रहा हूँ...उनको लो और अगर कोई समस्या लगे तो महीने भर बाद मुझसे मिल लेना”

मक्कू ने दवाएँ खरीद ली. एक आई ड्रॉप थी और दूसरी टेबलेट. दोनों आँखों के लिए थे. दिवु ने महीने भर दवा डाली और खायी.

अगले महीने जब मक्कू ने उससे पूछा तो उसने बताया कि समस्या जस की तस है अचानक से दिखना बंद हो जाने की. मक्कू फिर उसे लेकर मटरू के पास पहुँचा.

रविवार, 9 दिसंबर 2018

घी लगी रोटी (बाल कहानी) | kids story in hindi

राजकीय पशु विद्यालय में मध्यांतर की घंटी बजी। सभी बच्चे अपना-अपना टिफिन बॉक्स लेकर बैठ गये। पिक्कू बन्दर ने रोज की तरह आज फिर झिब्बू हाथी को चिढ़ाना शुरू किया,

“ए झिब्बू, देख मेरी रोटियाँ, घी लगी हैं...तेरी तो सूखी-सूखी”

झिब्बू की आँखें भी हमेशा की तरह भर आयीं। उसके पिता की छोटी सी किराना दुकान थी और माँ गृहिणी। मुश्किल से घर का खर्च चलाते हुए वे उसको पढ़ने भेजते थे जबकि पिक्कू बन्दर के पापा बैंक मैनेजर थे और मम्मी प्रोफेसर। आराम से जिंदगी कट रही थी। इसी बात का पिक्कू को बहुत घमंड था। वैसे तो वो सबको कुछ न कुछ टोकता फिरता था मगर झिब्बू से उसको विशेष चिढ़ थी। कारण कि झिब्बू हमेशा क्लास में प्रथम आता और शिक्षक उसकी प्रशंसा सबके सामने करते। वहीं पिक्कू किसी अन्य मेधावी छात्र को चॉकलेट, क्रीम का लालच देकर उसकी नकल करता तब भी केवल पास भर हो पाता क्योंकि अपने आलसी स्वभाव के कारण वह कई प्रश्नों के उत्तर लिखता ही नहीं था।

समय बीतता गया। पिक्कू और झिब्बू दोनों स्कूल से बढ़कर कॉलेज में आ गये। संयोगवश इसबार भी उनका नामांकन एक ही कॉलेज में हुआ था। उनकी जो कहानी स्कूल में थी, ठीक वही यहाँ भी शुरू हो गयी। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते-होते पिक्कू के मम्मी-पापा अपनी-अपनी नौकरियों से सेवानिवृत हो गये। उनको एकमुश्त लाखों रुपये मिले। उसी साल महाराज धिबरू शेर ने वन सेवा आयोग में नये प्रशासनिक अधिकारियों की वार्षिक नियुक्ति के लिए इच्छुक छात्र-छात्राओं को आवेदन करने का आदेश जारी किया।

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

मजदूर

हाथ न फैलाते मजदूर
मेहनत की खाते मजदूर

चाहे जैसा हो मौसम
काम में जुट जाते मजदूर

एक से बढ़कर एक मकान
बना के मुस्काते मजदूर

रंग लौट आये (बाल कहानी)


वीरपुर की रानी रक्षिका अपनी प्रजा से मिलकर वापस लौट रही थी कि अचानक रथ के घोड़े नियंत्रण से बाहर हो गये। अंगरक्षक कुछ समझ पाते इससे पहले ही रथ उनकी आँखों से ओझल हो चुका था।

"सारथी, सम्हालो रथ को" रक्षिका किसी प्रकार गिरने से बचती हुई चीखी। खुद को किसी अनजान रास्ते पर देख उसका मन घबराने लगा था। सारथी भी परेशान था।

"ज...जी महारानी जी, म...मैं प्रयास कर रहा हूँ लेकिन..." उसके कहते-कहते रथ पलट गया और रक्षिका पास की खाई में जा गिरी।

"महारानीऽऽ" रथ के नीचे दबा सारथी चिल्लाता रह गया। तीखी ढलान से लुढ़कता रक्षिका का शरीर जब शांत हुआ तो उसने अपनेआप को एक घाटी में पाया। आश्चर्य की बात ये कि इतनी ऊँचाई से गिरने के बाद भी उसे कोई चोट नहीं आयी थी। उसने चारों ओर नजरें दौड़ाईं। हरा-भरा स्थान था परंतु विचित्र। वहाँ जो पौधे लगे थे वे देखने में बिल्कुल पेड़ों जैसे थे लेकिन आकार में एक हाथ भर ही। अचंभित होकर वह उस जगह को देखने लगी। तभी एक आवाज आई।

"महारानी"

रविवार, 30 सितंबर 2018

बंदर आया (बाल कविता)


















मेरे घर में बंदर आया
उसे देखकर मैं घबराया
डंडा एक दिखाकर उसको
छत के रस्ते दौड़ भगाया

अनुभव तभी किया कुछ मैंने
बंदर का चेहरा उदास था
मेरे घर से निकल गया पर
बैठा अभी भी वहीं पास था

पछता के अपनी करनी पर
मैंने उसको पुनः बुलाया
पूछा, भाई क्या दुख तुमको?
कैसा संकट तुम पर आया?

रविवार, 2 सितंबर 2018

नव्या को मिली सीख (बाल कहानी)


नव्या पढ़ाई में जुटी थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी. मम्मी ने दरवाजा खोला तो बिजली बिल वाला था. वह पिछले महीने का बिल थमा के इस महीने की रीडिंग लेकर चला गया. पापा ने देखा तो इसबार भी पिछले माह के मुकाबले और ज्यादा बिल आया था. पूरे पाँच सौ रुपये ज्यादा. वे चिंतित होकर मम्मी से बोले,

“ये तो हर बार बढ़ता जा रहा बिजली बिल! ऐसे कैसे चलेगा?”

मम्मी जानती थी कि ये सब नव्या की ही लापरवाही का नतीजा. वह हमेशा कभी इस कमरे तो कभी उस कमरे के बत्ती, पंखे चलते छोड़ देती. दो-दो घंटे तक बेकार में टीवी चलता रह जाता और नव्या छत पर घूम रही होती. उनलोगों ने कई बार उसको समझाया कि बिजली को ऐसे बर्बाद नहीं करते, इसका खर्च देना पड़ता है लेकिन कौन मानने वाला था! नव्या उस समय “हाँ” कह देती और बाद में फिर से वही आदत लापरवाही की. मम्मी-पापा दुलारवश उसको कड़ाई से कुछ कह भी नहीं पाते थे.

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

क्यूट-क्यूट है दोस्त हमारी - बाल कविता














बिल्कुल एक गुड़िया के जैसी
क्यूट-क्यूट है दोस्त हमारी
जब हम कोई खेल खेलते
देती मुझको अपनी बारी