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शुक्रवार, 12 मार्च 2021

सेनानी का वंश (लघुकथा) | laghukatha in hindi | Hindi short stories

 

पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार राजेश आज मेरे घर आया हुआ था और मैं उसे उसके प्रस्तावित लघु उद्योग हेतु ऋण प्रक्रिया के विषय में समझा रहा था। एक पड़ोसी और बैंककर्मी होने के नाते यह मेरा नैतिक और व्यावसायिक दायित्व भी था। बहुत छोटा सा जेनरल स्टोर चलाने वाले राजेश की बढ़ती पारिवारिक आवश्यकताएँ उसे नये क्षेत्रों में प्रयास करने के लिए विवश कर रही थीं। उसे लगभग पच्चीस हजार रुपये का लोन चाहिए था।

 

पूरी प्रक्रिया को समझ के राजेश जब जाने को उठा तो यकायक मुझे हमारे संसदीय क्षेत्र के सांसद महोदय द्वारा इस गणतंत्र दिवस पर राजेश के दिवंगत दादा, जो कि स्वतंत्रता सेनानी थे, को मरणोपरांत सम्मान स्वरूप दी जानेवाली इक्कीस हजार रुपये की घोषणा का स्मरण हुआ। मैंने उसे टोका,

 

"अरे राजेश, तुमको तो अभी इस छब्बीस जनवरी पर इक्कीस हजार रुपये बैठे-बिठाए मिलने वाले! लोन के चक्कर में क्यों हो?"

 

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

बेरोजगारी (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

आज रोज की तरह मॉर्निंग वॉक के लिए मैं, मेरे मित्र सुजीत बाबू और दीपक जी साथ थे। रास्ते में सुनील मिला। औपचारिक अभिवादन के बाद मुझे उसके बेटे सनी का ध्यान आया जो दो दिनों पहले तनाव में होने की बात कह रहा था, कारण रोजगार नहीं मिल पाना!

 

मैंने सुनील से कहा,

 

"भाई, अपने बेटे को अपने मेंस पार्लर में क्यों नहीं बिठाते? काम न मिलने के कारण वह परेशान रहता है। तुमने एक बार बताया था कि तुम्हें उस मेंस पार्लर से पच्चीस से तीस हजार की कमाई होती है!"

 

"क्या बताऊं भैया?" सुनील निराश स्वर में बोला, "उसको मेंस पार्लर वाला काम पसंद नहीं, कहता है सरकारी नौकरी करूंगा"

 

कह कर वो बढ़ गया। दीपक जी मुझसे बोले,

 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

शॉपिंग (लघुकथा)



रविवार भारती (हरिभूमि) के 08 सितम्बर 2019 अंक में प्रकाशित

(और अधिक जूम इन करने के लिए फोटो पर क्लिक करें)

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

मरूद्यान (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

खिड़की पास चुपचाप खड़े मधुकर बाबू अपने पड़ोसी लड़के अरिजीत को दफ्तर के लिए निकलते हुए देख रहे थे। पिता की सेवाकाल में हुई मृत्यु के बाद अनुकम्पा के आधार पर उसे नौकरी मिल गयी थी। अपने रिटायरमेंट से मात्र छः महीने दूर थे मधुकर बाबू। उनके मन में नकारात्मक भावों ने फिर चीखना शुरू कर दिया - काश, मैं भी मर जाता! मेरे बेटे विवेक को भी ऐसे ही नौकरी मिल जाती! बच्चा दिन-रात मेहनत करता है लेकिन ये आज की गलाकाट प्रतियोगिता...ओह्ह! उसका ये दुखी चेहरा अब और देखा नहीं जाता।

मन मसोसते वे कमरे से बाहर निकले। बरामदे के निकट पहुँचने पर उन्हें विवेक और उसके दोस्त उत्पल की बातचीत सुनाई दी. उत्पल कह रहा था,

“अरिजीत के तो मजे हो गये। सरकारी नौकरी मिल गयी और हम हैं कि वहीं के वहीं घिस रहे हैं...”

उसकी बात सुनकर मधुकर बाबू के मन में उमड़-घुमड़ रहा विषाद और गहरा गया। उनके भारी कदम कुछ ही आगे बढ़ पाए थे कि विवेक का झल्लाया स्वर कानों में पड़ा,

“अबे तू आदमी है कि गिद्ध? बाप के मरने पर मिली नौकरी लेकर कौन बेटा मजा कर सकता है? चूल्हे में जाए ऐसी नौकरी...इससे तो मैं बेरोजगार ही ठीक हूँ”

मधुकर बाबू परदे की ओट से विवेक को देखते ही रह गये। उनकी आशाओं को नवजीवन मिल चुका था।(समाप्त)

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

बारूदी खेती (लघुकथा)

होश आनेपर विजेन्द्र ने अपनेआप को अस्पताल के बिस्तर पर पाया। सिर में उठते तेज दर्द और कमजोरी से टूटते शरीर से उसने किसी तरह दिमाग पर जोर डाला तो उसे याद आया कि वह पत्नी और बच्चों के साथ बाजार में था। तभी एक जोरदार धमाका हुआ...और...और...उसे आगे का कुछ याद नहीं आ रहा था। बेचैनी में वह छटपटाने लगा लेकिन पूरे शरीर में ड्रिप और पट्टियाँ बँधी थी। नर्स का ध्यान उसकी ओर गया तो भागी आयी और समझाया,

"प्लीज, लेटे रहिए...डॉक्टर साहब आते ही होंगे"

"म...मेरी...पत...पत्नी...बच्चे...!"

विजेन्द्र ने अपने परिवार के बारे में जानना चाहा लेकिन नर्स कुछ बता नही पायी। कमरे के बाहर से लोगों की आवाज आ रही थी,

"आतंकवादी हमला आखिर हमारे शहर में भी हो गया, भरोसा नहीं होता"

"आतंकवादियों के प्रति कब तक नरम रहेगी हमारी सरकार?"

"फिर पाकिस्तान के एक जेहादी गुट ने जिम्मेदारी ली है हमले की, समाचार टीवी पर आ रहा"

विजेन्द्र के दिल में तूफान उठने लगा। जात-पात की संकुचित मानसिकता में पड़कर पहले कहे गये अपने शब्द उसे याद आ रहे थे,

"आतंकवादी भी किसी के बेटे होते हैं...आतंकवादी भटके हुए नौजवान होते हैं...मानवाधिकार सबका हक है चाहे आपकी नजर में कोई आतंकवादी ही क्यों न हो"

उन्मादित अवस्था में विजेन्द्र ने आसपास नजरें घुमाईं। वह अपना मोबाइल ढूँढ रहा था जिससे वह आतंकवादियों के विनाश की माँग करता हुआ कोई पोस्ट लिख सके...अब तक जताई अपनी सहानुभुतियों के लिए जनता से क्षमा माँग सके! लेकिन शरीर बिल्कुल साथ ही नहीं दे रहा था। तभी नर्स, डॉक्टर वहाँ आये। विजेन्द्र ने डॉक्टर से कहा,

"डॉक्टर साहब, मेरा मोबाइल दीजिए"

डॉक्टर ने संवेदना भरी दृष्टि उसपर डाली और बोला,

रविवार, 16 दिसंबर 2018

नवनिर्माण की पीर (लघुकथा)

बढ़ई के कुशल हाथ अपनी कलाकारी दिखाते जा रहे थे और ठेला आकार ले रहा था। अपने बेटे के लिए वह ठेला बनवाने आया मनोहर विषादपूर्ण दृष्टि से सारा दृश्य देख रहा था।

कितने सपने सँजोए थे उसने! अपनी आधी जिंदगी तो एक ठेले पर सब्जियाँ बेचते ही निकल गई। सोचता था कि बेटा किसी प्रकार पढ़-लिख के ग्रुप डी की भी नौकरी पा जाए तो जिंदगी बदल जाएगी लेकिन बुरी संगत ने उसे भी कुछ करने नहीं दिया।

हार कर मनोहर ने अपने बेटे के लिए भी एक ठेला बनवाने का निर्णय लिया कि कहीं वह और अधिक गलत रास्ते की ओर न चल पड़े!

तभी उसे अपने परिचित सहाय बाबू की आवाज सुनाई दी जो वहीं से गुजर रहे थे। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में उसके कंधे पर हाथ मारते हुए पूछा,

"क्या भाई मनोहर, नया ठेला बनवा रहे हो?"

बन रहे ठेले पर एकटक से ताकते हुए मनोहर ने खोई सी आवाज में उत्तर दिया,

रविवार, 9 दिसंबर 2018

मकड़े के भाई (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

सिरसा चाय बनाने में मगन था। बड़ा लड़का मिन्टू तिरपाल की टूटी रस्सी वापस बाँध रहा था। तभी पुलिस की जीप आकर रुकी। दरोगा जी कड़कते हुए बोले

"बार-बार सालों को हटाओ लेकिन फिर लगा लेते टीन-टप्पर"

पुलिसवालों को देखते ही वहाँ बैठे दो-चार ग्राहक भी जल्दी से खिसक लिए। कुछ ही देर में अतिक्रमण हटाओ अभियान पूरा हो गया। पुलिस के जाने के बाद सिरसा और आसपास के उजाड़े गये अन्य दुकानदारों ने अपना-अपना ठीक हालत में बचा-खुचा सामान समेटना शुरू कर दिया। मिन्टू भी एक बोरा थामे खड़ा था। एक-एक कर सामान उसमें रखते सिरसा के चेहरे पर दीनता से भरी मुस्कान नाच उठी।

हीन (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

"भाभी, निकलता हूँ अब, शाम को सरला आ जाएगी आपकी मदद के लिए"

आटे की थैली अपने बड़े भाई मोहन की रसोई में रखते हुए मदन ने उसकी बीवी से कहा और बाहर को चल पड़ा। पीछे से भाभी की आवाज सुनाई दे रही थी,

"अच्छा नहीं लगता भैया सरला को कुछ काम देते लेकिन अब मुझसे होता नहीं भारी काम..."

मदन जानता था कि ये सब बस कहने की बातें। नगरपालिका के चतुर्थवर्गीय कर्मचारी मदन की हैसियत अपने राजपत्रित अधिकारी भाई के घर में एक नौकर से कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी। वह तो अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति की विवशता थी जो बार-बार मदन को यहाँ ले आती।

बाहर निकलने पर उसकी नजर अपने भाई मोहन पर गयी। मोबाइल पर आँखें जमाए मोहन बाबू ने उसकी ओर देखना भी जरूरी नहीं समझा। हमेशा की तरह मदन फिर हीनता के भाव से दबने लगा। तभी उसका बेटा अनिल वहाँ आया और कुछ पैसे देता हुआ बोला,

हैप्पी विंटर (लघुकथा)

सृष्टि खिड़की से बाहर देख रही थी. आते हुए सर्दी के मौसम की हल्की ठंडी हवा रह-रह के उसे छू जाती. तभी किसी की थपकी कंधे पर महसूस हुई,

“हैप्पी विंटर...”

सृष्टि ने मुस्कुरा के पीछे देखा. ये उसका पति साकेत था. सृष्टि बोली,

“हैप्पी क्या? नया साल थोड़े आ गया! ये तो मौसम का चक्र है! गर्मी, बरसात फिर सर्दी...”

“हाँ वो तो है...” साकेत ने उसके पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “इसके साथ ही हर मौसम अपने साथ कुछ न कुछ लेकर आता है, इसलिए उसका स्वागत करना चाहिए”

“तो सर्दी क्या लकर आ रही?” सृष्टि ने अपने द्दोनों हाथ साकेत के कंधे पर रख के उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा.

बुधवार, 7 नवंबर 2018

अंधकार से लड़ते दीये (लघुकथा)

दीपावली की रौनक घर से बाहर तक थी। लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद बरामदे में बैठे नीलोत्पल बाबू अपनी देहरी पर जगमग दीयों को निहार रहे थे। तभी पत्नी चित्रांगदा का आना हुआ।

“लीजिए मिठाइयां खाइए”

उसने प्लेट नीलोत्पल बाबू को देते हुए कहा और खुद भी उनके पास बैठ गई।

“क्या देख रहे एक टक से?”

सवाल सुनकर नीलोत्पल बाबू मुस्कुरा उठे,

रविवार, 30 सितंबर 2018

राष्ट्र प्रहरी (लघुकथा)

बड़ी सियासी पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न हो चुका था। रात गहरा चुकी थी। हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। रैनबसेरे में बैठी मंजू बच्चों को खाना खिला रही थी। पास में ही उसका पति मुकेश आराम कर रहा था। तभी कोई महँगी गाड़ी हूटर बजाती हुई उधर से गुजरी। अंदर बैठे युवाओं का "हू-हू" का तेज शोर सुनकर मंजू, मुकेश और बच्चे जरा देर के लिए डर गये। तभी गाड़ी के अंदर से कुछ तिरंगे वाले बैज और टोपियों का बंडल सड़क पर आ गिरा। न जाने किस खुमार में डूबे नौजवानों के पास अब ये चीजें संभालने की फुरसत और होश शेष नहीं था।

मुकेश जल्दी से उठा और सब चीजें इकट्ठा कर अंदर ले आया। मंजू चिढ़कर बोली,

"बड़ी गाड़ी वाले फेंककर चले गये और तुम ये सब संभाल रहे हो। शायद भूल गये हो कि तुम एक रिक्शेवाले हो"

मुकेश ने थके चेहरे पर मुस्कान जुटाई,

रविवार, 26 अगस्त 2018

जोर (लघुकथा)

नरेश बाबू खाना खा के अपनी दुकान पर लौटे ही थे कि ठीक सामने किसी का ट्रक खड़ा देख झुँझला उठे,

"अरे मनोरमा, ये ट्रक कौन लगा गया?"

"पता नहीं पापा, कोई सत्रह-अट्ठारह साल का लड़का था ड्राइवर, मैं पहचानती नहीं"

"ओह्हो..."

चिढ़े मन से पड़ोसी दुकानदार से ट्रकवाले के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास कर ही रहे थे कि वह ड्राइवर दिख गया। तुरंत उसके पास पहुँचे,

"अरे बेटा, दुकान के आगे गाड़ी नहीं लगाते..."

झल्लाहट को यथाशक्ति दबाते हुए बात कर रहे थे क्योंकि उस इलाके के अधिकतर ट्रक मालिक कखग जैसी मजबूत संख्याबल वाली दबंग जाति के थे। लड़का भी लापरवाही से जवाब दे रहा था। तभी कोई परिचित धीरे से बोला,

"ये ट्रक सोहना का, वो ससुरा बहुत जिद्दी है, कम-कम उम्र के लड़कों को ड्राइवर बना लेता है और इसी तरह की हरकतें करते चलते वे"

आवाज (लघुकथा)

अपने रिपोर्टिंग ऑफिसर की जन्मदिन पार्टी के दौरान सिद्धार्थ बाबू हाथ धोने नीचे वॉशरूम में पहुँचे ही थे कि बगल से कुछ आवाज सुनाई दी। झाँककर देखा तो एरिया मैनेजर श्रीवास्तव जी अपनी जूनियर सहकर्मी के साथ आपत्तिजनक अवस्था में! प्रथम दृष्टया तो यही लग रहा था कि उस सहकर्मी की सहमति नहीं थी। सिद्धार्थ बाबू का खून खौल उठा। वे गुस्से में उधर बढ़े ही थे कि आँखों के सामने पंद्रह साल पहले की एक घटना कौंध गयी। ठीक इसी तरह कंपनी के एक पूर्व वरीय अधिकारी को उनकी सेक्रेट्री के साथ देख उनका विरोध जताना और बाद में उसी सेक्रेट्री का प्रोन्नति लेकर आरोपी को दोषमुक्त करते हुए उल्टे उन्हीं पर अपनी छवि खराब करने के आरोप में एफआईआर... 

इलाज (लघुकथा)

नेताजी अस्पताल में भर्ती थे। मेडिकल टीम नियमित चेकअप के लिए आयी। आज दोनों डॉक्टर नये थे। उन्होंने जाँच शुरू की। पहला बोला,

"सर, आप ब्लडप्रेशर की शिकायत कर रहे लेकिन आपका ध्यान कभी अपने दाँतों के दर्द पर क्यों नहीं जाता?"

नेताजी आश्चर्य से उसका मुँह देखने लगे,

"अरे भाई, समस्या तो वह भी लेकर आए हैं ही हम, उसका भी इलाज करा रहे"

तब तक दूसरा बोल पड़ा,

"नहीं सर, आपका ध्यान अपने ब्लडप्रेशर पर ही जाता है केवल, पहले आपको दाँतों का इलाज कराना चाहिए"

पहला फिर से अपनी बात दुहरा उठा,

निरुत्तर (लघुकथा)

रात साढ़े बारह बजे भी वह जाग के परीक्षा की तैयारी में जुटी थी कि दस्तक हुई। सुनते ही उसके पिता ने दौड़ के दरवाजा खोला

"अरे सब ठीक है न? सबका मोबाइल बंद क्यों?" घबरायी आवाज में आगंतुक से पूछा

"कुछ भी ठीक नहीं है, पुलिस ने अचानक छापा मार दिया, कौन शहीद हुआ, कितने गिरफ्तार कुछ खबर नहीं"

"ओह्ह, तो अब?"

"ये कुछ रुपये रख, पाँच लाख के लगभग हैं, जितने हो सकें हथियार खरीद के रख लेना, निकलता हूँ मैं"

बुधवार, 1 अगस्त 2018

मजा (लघुकथा)

"कल बहुत मजा आया, हम चारों बहनें एकसाथ थीं, सबका परिवार भी"

"अच्छा!"

"हाँ खूब बातें की, खूब हाहा-हीही हुई छतपर"

"सही बात है, कई दिनों बाद सभी से मिलना जैसे रेगिस्तान में पानी मिल गया"

"हाँ रे, वो तो छोटी वाली कह रही थी कि मन कर रहा डीजे बुला लूँ"

"हाहा तो बुलाया क्यों नहीं!"

"तू और बोल, मार खानी थी क्या हमको!"

"मार! वो क्यों?"

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

कर्तव्यबोध (लघुकथा)


मानसी शाम को किचन में अकेले बहुत परेशानी महसूस कर रही थी. उसका पति अतुल घर पर नहीं था, अन्यथा वह रोज उसकी सहायता कर देता था.

कमरे से बार-बार आती दो साल की बेटी की रोने की आवाजें उसकी खीज और बढ़ा देतीं. दौड़ के कमरे में उसके पास जाना और फिर वापस रसोई में आना...ओह्ह्ह! माथे से पसीना पोंछते-पोंछते उसे गुस्सा आने लगा. तभी नजरें अपने ससुर पर पड़ीं जो अपने शयनकक्ष में बैठे टीवी देख रहे थे. मानसी और जल्दी में आ गयी.

“समय से खाना न मिले तो कहें भले कुछ नहीं लेकिन शक्ल खडूस वाली बन जाती इनकी...”

भुनभुनाती हुई वह पराँठे बनाने की तैयारी करने लगी. तभी एक डिब्बे में बचे कुछ पुराने रिफाइंड तेल का ख्याल आया.

“कोई ज्यादा पुराना तो है नहीं! बना देती हूँ इसी में...इतनी जल्दी नुकसान थोड़े करेगा!”

सोचकर उसने वही तेल कटोरी में डाल लिया. तभी उसका मोबाइल बजा. देखा तो उसके पापा का फोन आ रहा था. चहक के रिसीव किया लेकिन खाना बनाने की जल्दी थी सो बोल दिया कि रात में आराम से बात करुँगी.

लौट आये मम्मी-पापा (लघुकथा)

शोभा देवी बिस्तर पर लेटने से पहले अपनी खिड़की के टूटे काँच की जगह कामचलाऊ रूप से लगाए गये अखबारों के फटे हिस्से ठीक कर रही थीं। बेटा कब से काँच लाकर रखे हुए था लेकिन नखरेबाज बढ़ई आये तब तो! सर्दी की रात में थोड़ी सी भी ठंडी हवा सुई जैसी चुभती, ऊपर से सत्तर के पास पहुँचती उम्र। कुछ अखबार कम पड़ रहे थे। लाने जा ही रही थी कि डिम्पू और डिम्मी अखबारों का बंडल लिए आ पहुँचे। डिम्पू बोला,

"दादी, हटो, हम लगा देते हैं खिड़की में पेपर"

शोभा देवी के देखते ही देखते वे दोनों कुर्सी पर चढ़ के खिड़की से भिड़ गये। ठंडी हवा धीमी ही सही लेकिन लगातार आ रही थी। शोभा देवी ने बच्चों को टोका,

"अरे उतरो तुमलोग, हवा आ रही है, बीमार पड़ जाओगे"

डिम्मी अपनी चिरपरिचित शैली में अपने चश्मे को ठीक करती हुई बोली,

दवा (लघुकथा)

किराने की दुकान पर मैं कुछ सामान खरीद रहा था। साथ में पड़ोसी डॉक्टर साहब भी थे। तभी मैंने देखा कि विनीत भी वहाँ आया। भीड़ के कारण शायद उसकी नजर मुझपर नहीं पड़ी। उसने दुकानदार से कहा,

"आधा किलो घी देना भाई"

मैं उसकी इस डिमांड को सुनकर चौंक उठा, "घी! ये तो कल ही अपनी आर्थिक तंगी का रोना रोकर मुझसे पाँच सौ रुपये माँग के ले गया है और यहाँ घी खरीद रहा!" संयोगवश उसने नोट भी वही निकाला जो मैंने उसे दिया था, उसपर लगे अपने पेन के निशान को मैंने साफ-साफ देख लिया था। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं धीरे से डॉक्टर साहब का ध्यान उसकी ओर दिलाते हुए बोला,

"ये देखिए डॉक्टर साहब, कर्ज लेकर घी पीने वाली बात का साक्षात उदाहरण"

होलिकादहन (लघुकथा)

कॉलोनी में होलिकादहन के दौरान बच्चों का उत्साह पूरे जोर पर दिखा। पिंकू भी ताली बजा-बजा के धमाचौकड़ी में मगन था तभी उसकी माँ राधिका ने उसे बुलाया और रोटियों का बंडल थमाते हुए कहा,

"बेटा, देखो कोने में तुम्हारे दोस्त तुम्हारी राह देख रहे हैं, जाओ, उनको भी खाना खिला दो, अपने नाच-गाने में उनको भूल गये क्या?"

पिंकू ने देखा तो किसी कार की ओट में दुबके वही चार पिल्ले जिनको वह रोज रोटी देता था, दुबके उसकी ओर ही देख रहे थे लेकिन शायद भीड़-भाड़ से घबराकर वहाँ आये नहीं! पिंकू को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह रोटियाँ लिए उधर भागा। उसके पिता ने राधिका को टोका,