पूर्व निश्चित कार्यक्रम
के अनुसार राजेश आज मेरे घर आया हुआ था और मैं उसे उसके प्रस्तावित लघु उद्योग
हेतु ऋण प्रक्रिया के विषय में समझा रहा था। एक पड़ोसी और बैंककर्मी होने के नाते
यह मेरा नैतिक और व्यावसायिक दायित्व भी था। बहुत छोटा सा जेनरल स्टोर चलाने वाले
राजेश की बढ़ती पारिवारिक आवश्यकताएँ उसे नये क्षेत्रों में प्रयास करने के लिए
विवश कर रही थीं। उसे लगभग पच्चीस हजार रुपये का लोन चाहिए था।
पूरी प्रक्रिया को समझ के
राजेश जब जाने को उठा तो यकायक मुझे हमारे संसदीय क्षेत्र के सांसद महोदय द्वारा
इस गणतंत्र दिवस पर राजेश के दिवंगत दादा, जो कि स्वतंत्रता सेनानी थे, को मरणोपरांत सम्मान स्वरूप दी जानेवाली इक्कीस
हजार रुपये की घोषणा का स्मरण हुआ। मैंने उसे टोका,
"अरे राजेश, तुमको तो अभी इस छब्बीस जनवरी पर इक्कीस हजार रुपये
बैठे-बिठाए मिलने वाले! लोन के चक्कर में क्यों हो?"

