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शनिवार, 1 अगस्त 2020

नयी शुरुआत (कहानी)

नये साल के अवसर पर ट्रांसजेंडर्स की भीड़ एक दुकान के सामने नाच-गाना या कहें तो धमाचौकड़ी करने में जुटी थी ताकि दुकानदार जल्दी से पैसे दे दे. सड़क के दूसरी और खड़े रितेश की आँखें उनकी पूरी भीड़ में केवल एक ही सदस्य पर टिकी थीं, "सुनयना" पर. रितेश के मन में फिर से दस साल पहले हुई वही घटना घूमने लगी जब सुनयना, "नयन" हुआ करती थी. अपने माँ-बाप का दूसरा "शारीरिक बेटा". हाँ, वो केवल शरीर से ही तो नर था! उसके अंदर मादाओं वाली भावनाएँ थी. चाल-ढाल भी बिल्कुल स्त्रियों सी.

उस दिन उसके पिता काफी गुस्से में थे.

"साला, मउगा, मेहरा...सोच-सोच के हम खुश होते थे कि दो-दो बांके मर्द हैं हमारे बेटे लेकिन ये तो..."

माँ हमेशा की तरह बीच-बचाव की कोशिश में थी,

"जाने दीजिए न! उसके चक्कर में क्यों पड़ते आप?"

"अरे चुप" पिता उस दिन कुछ सुनने के मूड में नहीं थे. नयन को एक और थप्पड़ लगाते हुए चीखे, 

"अरे बेटी ही होनी थी तो वही हो जाती! कौन सा हम बेटे के लिए जान दे रहे थे! लेकिन ये बीचों-बीच का आइटम नहीं चलेगा यहाँ"

भाई, माँ और आसपास के लोगों के जुटने से हंगामा थमा लेकिन हर कोई जानता था कि ये क्षणिक शांति थी. नयन लगातार रो रहा था. बारह साल का बच्चा अपनी भावनाएँ ठीक से खुद ही नहीं समझ पाता तो किसी और को बताने के लिए शब्द लाये भी तो कहाँ से?

सोमवार, 4 मार्च 2019

बीवी के जुल्म (हास्य रचना होली विशेष)

"हुँह, कल शाम को गया हूँ बनिये के यहाँ होली का सामान लाने, तब नहीं कह सकती थी, अब सुबह-सुबह बेसन ले आओ, हलवा बनाना है! अब आज होलिकादहन का टाइम है, कौन कब रंग-रंग करने लगे बाजार में, किसको पता!"

भुनभुनाते सुहावन चचा घर से धोती सम्हालते हुए निकले। पड़ोस के लड़के टल्लू ने छेड़ा।

"काहे बीपी बढ़ा रहे हैं चचा होली के एक दिन पहले ही? गाना-वाना गाना चाहिए भोर में"

पिनपिनाये सुहावन चचा दाँत पीसते लाठी लिए उसकी ओर बढ़े। वह हँसता हुआ भाग गया। बच्चों के अपनी-अपनी नौकरी पर चले जाने के बाद सुहावन चचा के घर की लगभग रोज की ही ये कहानी थी। चाची बार-बार समझाती कि पैंसठ की उम्र हो गयी। चलो बच्चों के साथ रहते हैं लेकिन इनपर जवानी में की गई पहलवानी का जोश अबतक उतरा नहीं था। हरबार पलट के धौंस दिखा देते।

"अरे पिलपिलाया बुढ़वा बूझ गयी है क्या हमको भी? चार ठो जवान को यहीं के यहीं धोबियापाट दे देंगे अकेले, पहलवान कोई के भरोसे आराम नहीं करता हाँ"

चाची चुप हो जाती। जानती थी कि अक्ल तो पहले ही घुटने में थी। अब बुढ़ौती में और एड़ी की ओर बढ़ चली है। सो ज्यादा बहस करना भी...।

इधर सुहावन चचा रास्ते में ही थे कि एक मजनू की दुर्दशा वाला नौजवान टमटमुआ की चाय दुकान में रोता दिखा। उन्हें थोड़ा अजीब लगा। ये कौन रो रहा सवेरे-सवेरे यहाँ बैठ के? आज से ही रँग-पुत के भूत बन चुके टमटमुआ से पूछा तो उसने भी न में सिर हिला दिया।

"पता न कौन है, पाँच बजे से यहीं पर बैठा हुआ, पूछने पर भी कुछ नहीं बताता"

सुहावन चचा का दिल पसीज गया। दो चाय ऑर्डर कर के उसके पास बैठ गये।

"क्या बात है भाई? कौन हो? और काहे रो रहे? पहले तो इधर कभी नहीं देखा"

न जाने सुहावन चचा की पहलवान आवाज में क्या जादू था! नौजवान ने उनके पाँव पकड़ लिए।

"बहुत दुखी हूँ बाबा, कुछ रास्ता नहीं सूझ रहा"

"हुआ क्या? कुछ बताओ, शायद हमलोग मदद कर सकें!"

"बीवी अगर अच्छी न मिले तो फिर जीना कैसा!"

"ओहहो" उसके मुँह से यह बात सुनते सुहावन चचा का हृदय सीधे उसके हृदय से कनेक्ट हो गया फोर जी स्पीड से। फटाक से उसकी बीवी की जगह अपनी बीवी और नौजवान की जगह अपनेआप को रख के सोचने लगे। हालाँकि चाची बहुत अच्छी थी लेकिन चचा का पहलवानी दिमाग जो न कराए! तुरंत उस नौजवान से बोले,

"अच्छा वो क्या करती है तुम्हारे साथ? खाना नहीं बनाती?"

वो बोला, "खाना बनाने से क्या? खाना बना दे और बोले कि जाकर खुद खा लो, मेरे माँ-बाप को भी कड़क के बोले"

"च्च च्च, बहुत बुरा सचमुच" सुहावन चचा उसको ढाढस बँधाने के लिए बोले कि तभी फोन बजा। देखा तो चाची का था। रिसीव करते ही चाची ने पूछा,

"कहाँ अटक गये?"

"अरे आ रहे हैं न! रुको न दो मिनट!"

सोमवार, 7 जनवरी 2019

वो कौन थी? (कहानी)

“दीदी, मैं स्कूल के लिए निकल रही हूँ...” सुहानी ने बड़ी बहन सोनाली से कहा और सीढियों से नीचे उतर आयी. उसका पति राकेश घर के आगे वाले कमरे में बैठकर कोई किताब पढ़ रहा था. उसका ध्यान किताब से बाहर आया तो उसने दूर से ही कह दिया, 

“हाँ...तुम जाओ...मेरे भी स्टूडेंट्स आते होंगे” सुहानी मुस्कुराती हुई वहाँ से चली गयी.

उनलोगों की यही दिनचर्या थी. सुहानी निजी विद्यालय की शिक्षिका थी. वो अपने स्कूल चली जाती और राकेश कोचिंग क्लासेज में व्यस्त रहता. क्लासेज की पूरी व्यवस्था उसने घर के अगले कमरे में ही कर रखी थी. राकेश के माँ-बाप इन दिनों महीने भर के लिए अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गये हुए थे.

उधर, बालकनी में खड़ी सोनाली, सुहानी को बाय कर रही थी. सुहानी की शादी के बाद पहली बार वो उसके ससुराल आयी थी और बहन को खुश देख उसका मन खिल उठा था. सुहानी ने जब घर में राकेश के बारे में बताया तो पहलीबार में सबने गुस्सा ही जाहिर किया था. पापा तो संभवतः और मुखर विरोध करते लेकिन बाद में मम्मी ने बेटी की खुशी की खातिर समझा-बुझाकर उन्हें मना लिया. सोनाली को भी सुहानी के प्रेम विवाह से कोई आपत्ति नहीं थी. उसे दिक्कत थी तो केवल उसकी जल्दबाजी से. राकेश से मिलने के बस छः-सात महीनों के अन्दर सुहानी ने उससे शादी की रट पकड़ ली थी.

नौ बजने को आ गये. सोनाली को चाय की तलब लगी. वो नीचे आयी. राकेश विद्यार्थियों के बीच मगन था. सोनाली ने उससे चाय के लिए पूछा और फिर किचन में चली गयी.

लौटी तो देखा कि वो क्लास से अलग, पास वाले कमरे में किसी से फोन पर बात कर रहा था. सोनाली को देखकर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी और हँसकर बोला,

“वाह दीदी! आपने कितनी जल्दी बना ली...मैं तो पत्ती, दूध ही खोजता रहता इतनी देर...”

चाय देकर सोनाली फिर ऊपर चली गयी. टीवी देखते-देखते कैसे बारह बज गये, पता ही नहीं चला. घड़ी पर नजर गयी तो जल्दी से उठी. सुहानी के भी आने का समय हो चला था. वो किचन में चली गयी.

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

दिलवाला आम (कहानी) Dilwala Aam (Hindi Kahani)

मालती देवी अचार के लिए कच्चे आम काट रही थी. पंखा पूरे जोर पर था लेकिन तब भी पसीना आ जाता. कच्चे आम होते ही इतने कड़े! हँसुआ बार-बार ऐसे लगता मानों अब टूटा कि तब टूटा. पास बैठे अखबार पढ़ रहे मालती के पति डॉक्टर श्याम ने टोका,

“अरे हाथ कट जाएगा तुम्हारा तब मानोगी? लाओ न मैं काट देता हूँ!”

मालती ने माथे पर छलकता पसीना पोंछा और बोली,

“न-न, हो जाएगा, आप बैठिए आराम से...वैसे भी रोज तो सबका पेट, गला काटते ही हैं ऑपरेशन के लिए!”

और हँसती हुई वापस अपने काम में जुट गयी. खीज के श्याम ने भी मुँह वापस अखबार में घुसा लिया. जानते थे कि ये नहीं मानने वाली. प्रधानाध्यापिका है, घर में दो-दो नौकरानियाँ लगी हुईं तब भी जब तक खुद न जुते, चैन कहाँ! आज रविवार मिला तो फिर शुरू हो गयीं मैडम! अरे अब उम्र हो रही सेवानिवृत्ति की, थोड़ा आराम करने की आदत डालनी चाहिए मगर क्या कहा जाए!

तभी मालती बोल पड़ी,

“अरे देखिए न! ये कैसा आम निकला, एकदम दिल जैसा”

प्यार नहीं खोना (कहानी) | Love Story | Pyar nahi khona

सुधाकर सर अपने निजी कोचिंग संस्थान में छात्रों के साथ व्यस्त थे कि मोबाइल बज उठा. देखा तो पत्नी रीमा का फोन आ रहा था. क्लास से बाहर आकर रिसीव किया,

“हाँ बोलो रीमा...”

“अरे आज जल्दी लौटिए थोड़ा...” रीमा की आवाज में उत्साह था.

“काहे भई?” सुधाकर ने जानना चाहा.

“वो मधु अपनी मम्मी के साथ आने वाली है अभी थोड़ी देर में...” कहते-कहते रीमा बच्चों सी किलक उठी. सुधाकर सर को हँसी आ गयी. मधु उनके बेटे साहिल की दोस्त थी और दोनों में खूब निभती थी. इसके अलावा मधु का सीधा-सरल तथा व्यवहारकुशल स्वभाव सुधाकर और उनके परिवार के बाकी लोगों को भी बहुत पसंद आता था. हमेशा सोचते कि काश इसके ही जैसी लड़की हमारी बहू बनती! मधु के अपनी मम्मी को साथ लाने की बात सुनकर उसके पीछे छिपी संभावना को भाँप भीतर-भीतर वे भी खुश तो बहुत हुए लेकिन रीमा को छेड़ने के उद्देश्य से बोले,

“अरे तो सम्हाल लेना न तुम! आज नया बैच शुरू हुआ है, उसको देखना जरूरी मुझे!”

शनिवार, 8 सितंबर 2018

अविजित... (कहानी)


रात के सन्नाटे गहरा चुके थे तभी उसकी आँखें खुल गयीं. घड़ी पर ताका तो सुइयाँ साढ़े बारह पर थीं. अपने आसपास देखा. कहीं कोई न था. वह उठ के बैठ गया. कुछ मिनट किसी बात पर विचार करने में गये. फिर उसने पास रखी टेबल की दराज से डायरी-कलम निकाली और लिखना शुरू किया,

“ढाई आखरों, आज मैं बहुत खुश हूँ. बहुत-बहुत खुश! काश, तुम निराकार न होते और मैं तुम्हें इस पल गले लगा पाता! वैसे इसे कोई शिकायत मत समझना. तुमने तो खुद हजारों बार मुझे अपनी बाँहों में भरा है किसी न किसी रूप में. बस आज साक्षात तुम्हें, सिर्फ तुम्हें ही साकार देखने का जी कर रहा. खैर, कोई बात नहीं...”

लिखते-लिखते उसके चेहरे पर एक अनोखी संतुष्टि मुस्कुराने लगी थी. तभी उसे ध्यान आया कि वह पसीने से नहा चुका है! पंखा भी बंद था. बैठे-बैठे ही हाथ बढ़ाकर स्विच ऑन किया और दुबारा लिखने लगा,

सोमवार, 3 सितंबर 2018

क्षतिपूर्ति (कहानी)


रात के आठ बजने को थे. अपने एनजीओ से घर लौट रही तारिका आज फिर उदास थी. कारण वही, छोटे भाई अंकित का अवसाद पूर्ण जीवन और शराब में डूबते उसके सपने. कितना समझाया घर से बाहर तक सबने कि क्यों वैसी लड़की के लिए दुख मनाना जो खुद ही उसे छोड़ के चली गयी? लेकिन वो तो जैसे किसी की न सुनने की कसम खा चुका था.

निरुद्देश्य आँखों से कार की खिड़की से बाहर देखती तारिका पीछे छूटते जा रहे दृश्यों से भी ज्यादा तेज गति से अपने विचारों को मन में चलायमान किये हुई थी. ड्राइवर की आवाज से तन्द्रा टूटी,

“मैडम, घर पहुँचने ही वाले हम...”

एक लम्बी साँस के साथ अपने बैग और पानी की बोतल के साथ मानों वह खुद को भी समेटने लगी. कार घर के कंपाउंड में दाखिल हो गयी. गेट पर पति के नाम के नीचे लिखा “जिलाधिकारी” पदनाम देख उसका ध्यान हमेशा अपनी जिम्मेदारियों की ओर लौट आता था, चाहे थकान जितनी भी हो लेकिन आज मानसिक तनाव बहुत ज्यादा हो रहा था. सो अन्दर जाकर सोफे पर निढाल हो गयी तभी किसी कर्मचारी ने बताया, 

रविवार, 26 अगस्त 2018

बेटी ने “हाँ” कह दी (कहानी)


एमसीए फाइनल ईयर की छात्रा मधुमिता अपनी काउंसेलिंग क्लास से शाम को घर लौटी तो देखा कि दरवाजे पर किसी की कार लगी थी. पास जाते-जाते पता चल गया कि उसके पापा के दोस्तों में से एक और शहर के मशहूर कार शोरूम के मालिक विनय कुमार आये हुए हैं. साथ में शायद पूरा परिवार भी है!

अन्दर घुसते ही उसकी नजर अपने पापा पर पड़ी जो पूरे जोश के साथ उनकी आवभगत में लगे थे. मधुमिता की आहट पाते ही उसकी ओर देखा और चहक के बोले,

“आ गयी-आ गयी, शांतनु प्रसाद की बेटी और सुष्मिता प्रसाद की राजकुमारी आ गयी”

सबके चेहरे खिल उठे. माँ ने मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ा और अपने पास बिठा लिया. विनय बोले,

“कैसी हो बेटा?”

“जी अच्छी हूँ अंकल...” मधुमिता ने भी मुस्कान के साथ कहा. विनय की पत्नी सुमिता ने पास बैठे नौजवान का परिचय उससे कराते हुए कहा,

“ये ऋषभ है...बड़ा वाला बेटा हमारा...इसी साल अपनी पढाई पूरी कर ली ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की, कैंपस भी हो गया है फोर्ड में...”

सोमवार, 30 जुलाई 2018

प्यार की धुन (कहानी)



रोज की तरह आज भी बैंक में बहुत शोर-शराबा था लेकिन कैशियर नंदिनी के कानों में एक सन्नाटा सा पसरा था और मन में विचारों का ज्वार-भाटा। काउंटर में आँखें गड़ाए किसी मशीन की तरह नोट गिनकर ग्राहकों को थमाए जा रही थी। हाथ भी ऐसा सधा हुआ कि क्या मजाल किसी गलती की जो अनजाने में हो जाए! चिंता का कारण आज भी वही, उसके पति सुजीत का रवैया। पिछले महीने से ही न जाने किस दुनिया में रहने लगा है! न ढंग से खाना न पीना! न छेड़छाड़ करती वे प्यारी-प्यारी बातें न ही वह व्यवहार जिसने शादी के एक साल होते-होते ही उसे उससे ऐसे बाँध दिया था जैसे कितने जन्मों के साथी हों। बार-बार सोचती कि कहीं मुझसे ही तो कोई गलती नहीं हो रही जिससे सुजीत का दिल दुख रहा हो? लेकिन कुछ समझ नही आता। अगर कोई भूल हो रही है तो सीधे बता भी तो सकता है! अब क्या पराई रह गयी हूँ उसके लिए! कितनी बार पूछ लिया मगर हर बार टालमटोल। ओह्ह्ह!

“मैनेजर सर बुला रहे हैं तुमको, वो जिस ग्राहक का चेक कैश नहीं हो पाया था पिछले हफ्ते, वह आया हुआ”

सहकर्मी नेहा की आवाज ने नंदिनी को ख्यालों के भँवर से बाहर खींचा।

“अरे लेकिन यहाँ इतने लोग जमा अभी...” नंदिनी की बात अधूरी रह गयी।

“तुम जाओ न, मैं देख लूँगी यहाँ का...जानती नहीं सर की हड़बड़ी वाली आदत?” नेहा ने उसको हाथ पकड़ के कुर्सी से उठाते हुए कहा। नंदिनी जाने लगी तो नेहा ने फिर टोका।

“ये फाइल तो लेती जाओ! सब रिकॉर्ड इसी में...!”

“ओह हाँ”

नंदिनी को ध्यान आया और उसने जल्दी से वह फाइल उठा ली और निकल गयी। मैनेजर के केबिन में पहुँचते ही साहब शुरू हो गये।

“अरे नंदिनी, तुमको बोला था न कि पहले दस्तखत जाँच लेना...”

रविवार, 29 जुलाई 2018

मास्टर जी (कहानी)

"शिक्षक ही समाज का निर्माता होता है। हम क्या सीखेंगे, कैसे सीखेंगे इसका निर्णय लेने की जिम्मेदारी उसी की है। हमारा देश..." जिलाधिकारी महोदय का शिक्षक दिवस के मौकेपर आयोजित सम्मान समारोह में भाषण चल रहा था। पुरस्कृत किए जाने के लिए चयनित शिक्षिका सुधा सोनी अपने सहकर्मियों के साथ श्रोताओं की अगली कतार में बैठी थीं। रिटायरमेंट से मात्र तीन महीने पहले मिला सम्मान पूरे सेवाकाल का सुखद समापन कराता प्रतीत हो रहा था लेकिन क्या सचमुच सेवानिवृत्ति ही कर्तव्यों को विराम दे देगी? नयी पीढ़ियों को तराशते रहने का जो संकल्प लिया था, क्या वह पूर्णता को प्राप्त कर गया? विचारों का रथ मन को धीरे-धीरे स्मृतियों की ओर ले जाने लगा...

कोई चालीस-बयालीस साल पहले की बात होगी। बाबूजी उसदिन बहुत नाराज हो रहे थे,

प्राण-प्रतिष्ठा (कहानी)

"तो सरकार, कितने का बिल बना इस महीने?" आईने के सामने बैठी सपना अपने गीले बालों पर तौलिया फिराती शरारत भरे अंदाज में बोली।

"रात के साढे दस बज रहे हैं मैडम, बिल का हिसाब कल लेना" मच्छरदानी लगाने में मगन उसके पति सिद्धार्थ ने अलसाई आवाज में जवाब दिया।

"अच्छा, कल कितने बजे का मुहूर्त निकलवाया है इसके लिए?" सपना ने तौलिए को उसके सिर पर दे मारा।

"अरे-अरे, तू भी न बहुत शैतान होती जा रही है, इस महीने लगभग पंचानवे हजार के आसपास की आमदनी हुई लेकिन पापा को कुछ जरूरत थी सो उन्होंने रख लिए, चल अब सो जा" कहता सिद्धार्थ बिस्तर पर निढाल हो गया।

सुनते ही सपना का मन उचट सा गया। अपने ससुर महेन्द्र वर्मा की छवि उसकी नजरों में कोई विशेष अच्छी नहीं थी। उसने थोड़ी और बातें करनी चाही इस बारे में लेकिन सिद्धार्थ सो चुका था। वह भी बत्ती बुझा के चुपचाप आकर बगल में लेट गयी किन्तु नींद आँखों से गायब हो चुकी थी।

शनिवार, 28 जुलाई 2018

सावन (कहानी)

"शाम को ही लौटूँगा, खाना मत बनाना दोपहर का मेरा" 

कहते हुए सुदर्शन ने छाता उठाया और निकल गया। बाहर सावन पूरे जोरोंपर था। मनोरमा ने चुपचाप एक नजर उसकी ओर डाली फिर चेहरा घुमा लिया। कितना बदल चुका था उसका पति। जबतक ससुर जी जीवित थे, सबकुछ ठीक चल रहा था। वे सारी खेती-बाड़ी अपने कंधेपर उठाये घर से बाहर तक के सारे काम हँसते हुए ऐसे कर जाते थे मानों कुछ मेहनत ही नहीं लग रही हो। अपने एकलौते बेटे से इतना मोह कि कभी कोई अपेक्षा नहीं की उससे। चालीस का होने को था, एक बारह साल की बेटी का बाप और किसी का पति लेकिन आदत वही सोलहवाली। लापरवाह, आवारा, सारा दिन इधर से उधर मटरगश्ती। वह अक्सर समझाने की कोशिश करती कि बाबूजी का हाथ बँटाओ, थोड़ा सहयोग दो घर में पर सुनता कौन था? हरबार का एक रटा-रटाया जवाब, अरे मेरी लाजो, तू क्यों चिन्ता करती रहती है? बाबूजी सब बहुत अच्छे से देख ही तो लेते हैं, मेरी क्या जरूरत? वे जिसदिन कुछ कहेंगे तो क्या मैं नहीं करूँगा? अंततः दो साल पहले बाबूजी परिवार की जिम्मेदारियों का कलश उठाये-उठाये ही सो गये। बस तभी से जैसे ग्रहण लग गया घर को। धीरे-धीरे करके सारा पाँच बीघा खेत सुदर्शन ने औने-पौने दामों में बेच डाला। घर के एक हिस्से को किरायेपर लगाकर जैसे-तैसे खर्च चल रहा। तनाव का नाम लगाके अब तो कभी-कभी पीने भी लगा। बीवी की नहीं तो कम से कम अपनी माँ की ही सुने, लेकिन नसीब में दुख हों तो बुद्धि भी बौरा जाती है। इन्हीं ख्यालों में डूबी मनोरमा के चेहरेपर अचानक हवा के तेज झोंके ने खुले आँगन से बरसती बूँदों को ला पटका। उसका ध्यान रिमझिम बरसात की ओर चला गया। उसकी पायल के घुँघरू भी तो ऐसे ही बजते थे न! छन-छन, रुन-झुन! बहुत बुरा है सुदर्शन, पिछले महीने उनको भी छीन के ले गया बेचने के लिए। किसी दिन मुझे भी ऐसे ही....." सोचते-सोचते उसकी आँखें भी सावन जैसी होने लगीं कि तभी सास राधा ने बुलाया,

बँसवारी (कहानी)

करमू भैया उदास मन से बँसवारी में लेट गये। ढलता सूरज धुँधलके के लिए रास्ता बनाने में लगा था। दोपहर से जारी खोने-पाने की उधेड़बुन ने करमू के अंदर हलचल मचा रखी थी। आज तीसरे बेटे मोहन की भी नौकरी एक अच्छी प्राइवेट कंपनी में हो गयी और वो चला गया। बाकी के दोनों बड़े भाइयों की ही तरह महीना कोई ज्यादा तो नहीं पर हाँ इतना था कि अपना और अपने बीवी बच्चों को पाल ले जोड़-चित करते। मौका तो खुशी का था लेकिन घर का एकदम खाली सा होना उनको बहुत अखर रहा था।

वही दिन याद आने लगे जब १०-१० रुपये बाँस बेचकर घर का खर्च निकाला था। चार बड़े भाइयों ने सारी जमीन-जायदाद आपस में बँटिया ली। बाबा और गाँव-समाज के कारण एक खेत और पुश्तैनी मकान का कुछ हिस्सा मिल गया। पहले तो सब्जियाँ उगाया करते थे, मँगला (उनकी पत्नी) के आने के बाद जब अपना परिवार बन गया तो खर्चे बढ़ गये। एक दोस्त की बात याद आयी जो कागज बनाने की फैक्ट्री में काम करता था। उसने बताया कि मालिक लाखों का बाँस खरीदते हैं हरसाल। बस ये ही धुन ऐसी चढ़ी कि करमू भैया ने भी बाँस की खेती शुरु कर दी और सब्जियों के खेत ने बँसवारी का रूप ले लिया। उस समय किसी अगरबत्ती या कागज कंपनी के मालिक का तो ऑर्डर कभी मिला नहीं पर हाँ, आस-पास के लोगों के घर शादी-ब्याह या बाकी कार्य-प्रयोजनों में उनकी ही बँसवारी के बाँस जाने लगे। गाँव की इकलौती बँसवारी जैसे सबकी दुलारी हो गयी। सुखदेव, रंजीत और मोहन तीनों भाई उसी में खेलते तो बड़े हुए।