नये साल के अवसर पर ट्रांसजेंडर्स की भीड़ एक दुकान के सामने नाच-गाना या कहें तो धमाचौकड़ी करने में जुटी थी ताकि दुकानदार जल्दी से पैसे दे दे. सड़क के दूसरी और खड़े रितेश की आँखें उनकी पूरी भीड़ में केवल एक ही सदस्य पर टिकी थीं, "सुनयना" पर. रितेश के मन में फिर से दस साल पहले हुई वही घटना घूमने लगी जब सुनयना, "नयन" हुआ करती थी. अपने माँ-बाप का दूसरा "शारीरिक बेटा". हाँ, वो केवल शरीर से ही तो नर था! उसके अंदर मादाओं वाली भावनाएँ थी. चाल-ढाल भी बिल्कुल स्त्रियों सी.
उस दिन उसके पिता काफी गुस्से में थे.
"साला, मउगा, मेहरा...सोच-सोच के हम खुश होते थे कि दो-दो बांके मर्द हैं हमारे बेटे लेकिन ये तो..."
माँ हमेशा की तरह बीच-बचाव की कोशिश में थी,
"जाने दीजिए न! उसके चक्कर में क्यों पड़ते आप?"
"अरे चुप" पिता उस दिन कुछ सुनने के मूड में नहीं थे. नयन को एक और थप्पड़ लगाते हुए चीखे,
"अरे बेटी ही होनी थी तो वही हो जाती! कौन सा हम बेटे के लिए जान दे रहे थे! लेकिन ये बीचों-बीच का आइटम नहीं चलेगा यहाँ"
भाई, माँ और आसपास के लोगों के जुटने से हंगामा थमा लेकिन हर कोई जानता था कि ये क्षणिक शांति थी. नयन लगातार रो रहा था. बारह साल का बच्चा अपनी भावनाएँ ठीक से खुद ही नहीं समझ पाता तो किसी और को बताने के लिए शब्द लाये भी तो कहाँ से?






