मालती देवी अचार के लिए कच्चे आम काट रही थी.
पंखा पूरे जोर पर था लेकिन तब भी पसीना आ जाता. कच्चे आम होते ही इतने कड़े! हँसुआ
बार-बार ऐसे लगता मानों अब टूटा कि तब टूटा. पास बैठे अखबार पढ़ रहे मालती के पति
डॉक्टर श्याम ने टोका,
“अरे हाथ कट जाएगा तुम्हारा तब मानोगी? लाओ न
मैं काट देता हूँ!”
मालती ने माथे पर छलकता पसीना पोंछा और बोली,
“न-न, हो जाएगा, आप बैठिए आराम से...वैसे भी रोज
तो सबका पेट, गला काटते ही हैं ऑपरेशन के लिए!”
और हँसती हुई वापस अपने काम में जुट गयी. खीज के
श्याम ने भी मुँह वापस अखबार में घुसा लिया. जानते थे कि ये नहीं मानने वाली.
प्रधानाध्यापिका है, घर में दो-दो नौकरानियाँ लगी हुईं तब भी जब तक खुद न जुते,
चैन कहाँ! आज रविवार मिला तो फिर शुरू हो गयीं मैडम! अरे अब उम्र हो रही
सेवानिवृत्ति की, थोड़ा आराम करने की आदत डालनी चाहिए मगर क्या कहा जाए!
तभी मालती बोल पड़ी,
“अरे देखिए न! ये कैसा आम निकला, एकदम दिल जैसा”
