"हुँह, कल शाम को गया हूँ बनिये के यहाँ होली का सामान लाने, तब नहीं कह सकती
थी, अब सुबह-सुबह
बेसन ले आओ, हलवा बनाना है! अब आज होलिकादहन का टाइम है, कौन कब रंग-रंग
करने लगे बाजार में, किसको पता!"
भुनभुनाते सुहावन चचा घर
से धोती सम्हालते हुए निकले। पड़ोस के लड़के टल्लू ने छेड़ा।
"काहे बीपी बढ़ा रहे हैं चचा होली के एक दिन
पहले ही? गाना-वाना गाना
चाहिए भोर में"
पिनपिनाये सुहावन चचा
दाँत पीसते लाठी लिए उसकी ओर बढ़े। वह हँसता हुआ भाग गया। बच्चों के अपनी-अपनी
नौकरी पर चले जाने के बाद सुहावन चचा के घर की लगभग रोज की ही ये कहानी थी। चाची
बार-बार समझाती कि पैंसठ की उम्र हो गयी। चलो बच्चों के साथ रहते हैं लेकिन इनपर
जवानी में की गई पहलवानी का जोश अबतक उतरा नहीं था। हरबार पलट के धौंस दिखा देते।
"अरे पिलपिलाया बुढ़वा बूझ गयी है क्या हमको भी? चार ठो जवान को
यहीं के यहीं धोबियापाट दे देंगे अकेले, पहलवान कोई के भरोसे आराम नहीं करता हाँ"
चाची चुप हो जाती। जानती
थी कि अक्ल तो पहले ही घुटने में थी। अब बुढ़ौती में और एड़ी की ओर बढ़ चली है। सो
ज्यादा बहस करना भी...।
इधर सुहावन चचा रास्ते
में ही थे कि एक मजनू की दुर्दशा वाला नौजवान टमटमुआ की चाय दुकान में रोता दिखा।
उन्हें थोड़ा अजीब लगा। ये कौन रो रहा सवेरे-सवेरे यहाँ बैठ के? आज से ही रँग-पुत
के भूत बन चुके टमटमुआ से पूछा तो उसने भी न में सिर हिला दिया।
"पता न कौन है, पाँच बजे से यहीं पर बैठा हुआ, पूछने पर भी कुछ
नहीं बताता"
सुहावन चचा का दिल पसीज
गया। दो चाय ऑर्डर कर के उसके पास बैठ गये।
"क्या बात है भाई? कौन हो? और काहे रो रहे? पहले तो इधर कभी नहीं देखा"
न जाने सुहावन चचा की
पहलवान आवाज में क्या जादू था! नौजवान ने उनके पाँव पकड़ लिए।
"बहुत दुखी हूँ बाबा, कुछ रास्ता नहीं
सूझ रहा"
"हुआ क्या? कुछ बताओ, शायद हमलोग मदद कर सकें!"
"बीवी अगर अच्छी न मिले तो फिर जीना कैसा!"
"ओहहो" उसके मुँह से यह बात सुनते सुहावन
चचा का हृदय सीधे उसके हृदय से कनेक्ट हो गया फोर जी स्पीड से। फटाक से उसकी बीवी
की जगह अपनी बीवी और नौजवान की जगह अपनेआप को रख के सोचने लगे। हालाँकि चाची बहुत
अच्छी थी लेकिन चचा का पहलवानी दिमाग जो न कराए! तुरंत उस नौजवान से बोले,
"अच्छा वो क्या करती है तुम्हारे साथ? खाना नहीं बनाती?"
वो बोला, "खाना बनाने से
क्या? खाना बना दे और
बोले कि जाकर खुद खा लो, मेरे माँ-बाप को
भी कड़क के बोले"
"च्च च्च, बहुत बुरा सचमुच" सुहावन चचा उसको
ढाढस बँधाने के लिए बोले कि तभी फोन बजा। देखा तो चाची का था। रिसीव करते ही चाची ने पूछा,
"कहाँ अटक गये?"
"अरे आ रहे हैं न! रुको न दो मिनट!"

