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सोमवार, 16 जुलाई 2018

चाँद चलने लगा (गीतिका)

चार दाने लिए लौट आने लगी।
भोर फिर घोंसलों में समाने लगी।

चाँद चलने लगा साँझ को थामकर,
चाँदनी देह से झरझराने लगी।

कुछ अलग सी सुवासें लिए है पवन,
प्रीत लगता उसे भी सताने लगी।

कामना जो उजालों तले मौन थी,
पा अँधेरा पुनः सिर उठाने लगी।

गुप्त तो बात कुछ, भान होता हमें,

सच का नकाब हो जाए (गीतिका)

दिल न जलती किताब हो जाए।
गुम न कोई जवाब हो जाए।

झूठ का काम आज करना फिर,
एक सच का नकाब हो जाए।

शौक से हम करें शुरू पीना,
प्रीत तेरी शराब हो जाए।

पीर ने जोश-होश को बोला,
साथियों! इंकलाब हो जाए।

वह कली आजकल तरसती है,

सोमवार, 1 सितंबर 2014

गीतिका का तानाबाना - ओम नीरव

प्रस्तावना - ग़ज़ल एक काव्य विधा है जिसका प्रयोग किसी भी भाषा में किया जा सकता है ! इसलिए ग़ज़ल विधा को उर्दू की सीमित परिधि से बाहर निकालकर विस्तार देने के लिए हिंदी में ग़ज़ल लेखन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है l बहती सरिता का जल निर्मल रहता है जबकि ठहरे हुए पोखर का जल सड़ने लगता है इसलिए ग़ज़ल को विस्तार देना अपरिहार्य है , 'ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने देना' उचित नहीं है l
हिंदी भाषा और हिन्ही व्याकरण में लिखी ग़ज़ल को एक अलग नाम 'गीतिका' देने की भी आवशयकता है , इससे जहां एक ओर उर्दू ग़ज़ल का मौलिक स्वरुप अक्षुण्ण रहेगा , वहीँ दूसरी ओर 'गीतिका' को भी एक स्वतंत्र विधा के रूप में सम्मान से देखा जा सकेगा !
गीतिका एक हिंदी छंद का नाम भी है किन्तु यह संयोग मात्र है , उस छंद से इस 'गीतिका' का कोई साम्य  नहीं है ! मेरी जानकारी के अनुसार इस परिप्रेक्ष्य में 'गीतिका' शब्द का प्रयोग सर्व प्रथम राष्ट्रीय कवि पद्म श्री गोपाल दास नीरज जी के द्वारा किया गया था ! अस्तु 'गीतिका' की प्रस्तुत अभिधारणा श्रद्धेय नीरज जी को साभार सप्रेम समर्पित है !

गीतिका की मुख्य अभिधारणाएं निम्नवत हैं --