चार दाने लिए लौट आने लगी।
भोर फिर घोंसलों में समाने लगी।
चाँद चलने लगा साँझ को थामकर,
चाँदनी देह से झरझराने लगी।
कुछ अलग सी सुवासें लिए है पवन,
प्रीत लगता उसे भी सताने लगी।
कामना जो उजालों तले मौन थी,
पा अँधेरा पुनः सिर उठाने लगी।
गुप्त तो बात कुछ, भान होता हमें,
भोर फिर घोंसलों में समाने लगी।
चाँद चलने लगा साँझ को थामकर,
चाँदनी देह से झरझराने लगी।
कुछ अलग सी सुवासें लिए है पवन,
प्रीत लगता उसे भी सताने लगी।
कामना जो उजालों तले मौन थी,
पा अँधेरा पुनः सिर उठाने लगी।
गुप्त तो बात कुछ, भान होता हमें,