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शुक्रवार, 19 मार्च 2021

Holi-sandesh-Happy-Holi-Wishes

 Tags : Happy Holi Wishes | holi sandesh | होली की शुभकामनाएँ | बधाई | सन्देश | SMS | Text | Quotes | Status | Shayari | Advance Wishing 



(1)

होली में झलके रंगों से प्यार

मुबारक हो आपको, होली का त्योहार


(2)

प्यार तुम्हारा, रंग हमारा

खुशियों का दिलकश नजारा

गालों पर तुम्हारे जो निखरा गुलाल

सज गया जिंदगी का आँगन सारा


(3)
होली में आँखों की भंग पिला दो
दिल को उसका दिलदार मिला दो
गुझिया और भी मीठी लगेगी
अपने हाथों जो तुम थाली सजा दो

(4)
तेरे होठों में लाल रंग
आँखों में नीला सागर
जुल्फों की काली घटाएँ
दिल प्रेम की गागर

(5)
तुम ही बगिया, मस्त बहार
मेरे रंगों का संसार
आओ तुम्हें गुलाल पुकारे
आया होली का त्योहार

Holi Wishes Quotes & SMS in Hindi 2021 | holi festival wishes | #holi_festival_wishes 

मंगलवार, 9 मार्च 2021

जय महादेव, जय शिवशंकर












जय महादेव, जय शिवशंकर

जय सृष्टिरूप, जय प्रलयंकर


तुम ही हो वेद ऋचाओं में

सावन की मस्त घटाओं में

रविवार, 2 अगस्त 2020

आत्मा लिपटी रहे श्रीराम से





आत्मा लिपटी रहे श्रीराम से
तन चला जाए जहाँ जिस काम से

जब पड़ाव मिले, अयोध्या में मिले
याद भी आएँ न लंका के किले

घनाक्षरी (होली विशेष)

लाल, पीले, हरे सभी, संग-संग झूम रहे, खुशियों ने कामना की दुनिया सजायी है।
जम के उड़ा रही गुलाल छत बावरी तो बूढ़े अँगना को याद यौवन की आयी है।
मालपुआ सबको मिठास बाँटने में जुटा, सपनों ने किलकारी जम के लगायी है।
रंग ही तुम्हारा हाय! लगा नहीं मुझ को तो, कैसे कहे दिल मेरा, मेरी होली आयी है॥

कौन सी वो पिचकारी, कौन सा गुब्बारा होगा, भर कर तुमको जो मुझ पर डाल दे।
कहाँ होगा ढोलक वो, कदमों को तुम्हारे जो, साथ मेरे थिरकाने वाली मस्त ताल दे।
मुख को तलाश उस गुझिया की जिसको हो स्वाद मिला तुमसे, जो मुझको सम्हाल दे।
खोज का भँवर, होली डूबी जाती, चीख रही, साथी! ख्याल उसका तू चित्त से निकाल दे॥

रंगों ने सिंगार तो किया पर आधा-अधूरा, आ के अपनी कला से उसको निखार दो।
गीत फाग वाले जरा छंद से भटक रहे, गोद में बिठाओ उन्हें, उनको सँवार दो।
चूड़ी-पायलों की टोली व्यग्र है खनकने को, मनुहार कर रही, कुछ तो दुलार दो।
जीवन का कैनवास, श्वेत-श्याम चित्र मेरा, इस होली लगे हाथ मुझे भी उबार दो॥

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

भगवा















बहुत जल्दी दिखेगा 

देख लेना ये गगन भगवा


हमारी आन है भगवा, हमारी जान है भगवा
हमारी मातृभू के तेज की पहचान है भगवा
हमें पाला सदा जिसने बहाकर प्रेम निर्झरणी
उसी माँ भारती के नेह का गुणगान है भगवा

नियम, अधिकार है भगवा, सुखद, उपहार है भगवा
हमारे शीश पर सजकर बना शृंगार है भगवा
जहाँ उपवन वहाँ ये सावनी बौछार बन जाता
जिधर काँटे, दुधारी बस वहाँ तलवार है भगवा

हमारी हर लगन भगवा, हमारा मन मगन भगवा
हृदय में जल रही जो नित्य वो पावन अगन भगवा
अभी तो हाथ में ही है ध्वजा के रूप में लेकिन
बहुत जल्दी दिखेगा, देख लेना ये गगन भगवा

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

शनिवार, 23 मार्च 2019

दुलरुआ फाग (गीत)















ग्यारहों मासों का
इकलौता दुलरुआ फाग

देखते उसको उतरतीं
पूस-माघी त्योरियाँ
चैत्र ले के गोद में
रहता सुनाता लोरियाँ
जेठ और बैसाख
रखते दूर अपनी आग

सानते भूले नहीं
सावन या भादो कीच में
टोकने आते नहीं हैं
क्वार-कातिक बीच में
नेह अगहन का मिले
आषाढ़ रखता लाग

मंगलवार, 19 मार्च 2019

फाग का उत्कर्ष (गीत)














देह पर मेरी
लगा दो रंग तुम अपने

फाग का उत्कर्ष है
ऋतुराज गाता झूमकर
नाचती खुशियाँ हवा संग
माथ सबके चूमकर
प्रेम का जोगी
पुनः माला लगा जपने

तृप्तियों की गंध से
हर घर सुवासित हो रहा है
दिल, गुलालों की चपलता
देख मुखरित हो रहा है
पूर्णता की माँग कर 
इच्छा लगी तपने

रंग बिन सौंदर्य का
साम्राज्य कैसा? कुछ नहीं
तुम गले मुझको लगा लो
मोक्ष मैं पा लूँ यहीं
बस तुम्हारी आस में
मेरे सभी सपने

शनिवार, 16 मार्च 2019

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

धर्म - जीवन की अनिवार्य अवधारणा

धर्म, प्रकृति और ब्रह्माण्ड के प्रति हमारा कृतज्ञता ज्ञापन है. पृथ्वी से लेकर सूर्य तक, सनातन संस्कृति की मान्यताएँ हर उस तत्व में व्याप्त ईशत्व का साक्षात् अनुभव करती हैं जिनसे जीवन के तीनों चरण (आरम्भ, पालन एवं अंत) प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं.

“कण-कण में भगवान” जैसा हमारा चिरंतन विश्वास, विज्ञान को पिछले दशक में “गॉड पार्टिकल” के रूप में समझ आया. “धर्म” शब्द का वितान अंग्रेजी के “रिलिजन” से कहीं अधिक व्यापक और ग्रहणीय है. धर्म कोई संप्रदाय नहीं अपितु जीवन की उपस्थिति के लिए एक अनिवार्य धारणा है. धार्मिक दृष्टिकोण, प्राप्ति का स्वयं श्रेय नहीं लेता और अप्राप्ति का दोषारोपण किसी अन्य पर नहीं करने देता. दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का कल्याण है.

उसे न तो अहंकार हो सकेगा और न ही समाज के किसी वर्ग पर आक्रोश. धर्म से हटने पर परिस्थितियाँ ठीक इसके विपरीत हो जाती हैं. संसार की कोई भी वस्तु, धर्म से परे नहीं है. “धर्म को नहीं मानना” जैसी बात भ्रम के सिवा कुछ नहीं. जीवित-निर्जीव, हर चीज अपने धर्म का पालन करती है. 

धर्म वो जिसे धारण किया जाए. पूजा-पाठ, धर्म का एक अंग है, सम्पूर्ण धर्म नहीं. धर्म को ठीक से नहीं समझ पाने के कारण केवल पूजा-पाठ को ही धर्म मान लिया जाता है और इसकी भाँति-भाँति से नकारात्मक विवेचना होने लगती है. पूजा, हमारी धार्मिक  अवधारणा को पुष्ट करने एवं दैवीय उर्जाओं के अंश को आशीर्वाद के रूप में प्राप्त करने का साधन है. धर्म, मनुष्यता के समग्र विकास के लिए सकारात्मक वातावरण निर्मित करता है. इसलिए अपने धर्म की रक्षा करनेवाला अपनेआप ही रक्षित हो जाता है.

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

बुधवार, 7 नवंबर 2018

दीप सजे

















दीप सजे, चौखट मुस्कायी
सबके मन दीपावली आयी

आतिशबाजी बचपन के संग
लगी कदम से कदम मिलाने
नसीहतों की स्नेहिल छाया
साथ खड़ी उनको दुलराने
धूम-धड़ाकों ने अंबर तक
अपनी उपस्थिति दिखलायी

रविवार, 26 अगस्त 2018

रेशमी नेह (गीत)





















रेशमी नेह से जब कलाई सजी
स्वर्ण बन
दो हृदय चमचमाने  लगे

रोली-चन्दन हुई भावना मुग्ध हो
भाल पर
गर्व से मुस्कुराती दिखे
आरती की सुवासित ये ज्योति अखंड
मार्ग सम्बन्ध के
जगमगाती दिखे
मेवे-मिष्टान्न के थाल प्यारे सभी
मीठे को
और मीठा बनाने लगे

राष्ट्रवंदना (पंचचामर छंद)





















प्रणाम मातु भारती, प्रणाम भूमि वत्सला।
ममत्व, सौख्य दायिनी, सुरम्य, सौम्य, उज्ज्वला।
विचार, भाव वेद के, पवित्रता पुराण की।
अनन्य शौर्य शक्ति का व धार शंभु-बाण की॥

शनिवार, 21 जुलाई 2018

जग रहा है फाग मन में

जग रहा है फाग मन में
आस का अनुप्रास बन के

मापनी ने पास स्वप्नों को बुलाया
रंग खिलती भोर से हँस कर मँगाया
ढोल अंदर मुस्कुरा तैयार बैठे
आज बजने का समय जो लौट आया

हम भी बनें न्यारी पतंग

इस मकर संक्रांति
चल हम भी बनें न्यारी पतंग

उत्तरायण सूर्य से
मन में रखी हर बात बोलें
डोर की गरिमा तले
कुछ पंछियों के संग हो लें
निकट से देखें
सजाता बादलों में कौन रंग

रविवार, 15 जुलाई 2018

मंदिर में सपना (नवगीत)



मैं था तेरे मंदिर में
कल ये सपना आया माता

नत हो तुझको शीश नवाया
श्रद्धा से भर दीप जलाया
अंदर कोई हँसा उसी क्षण
कौन! यही मैं समझ न पाया
निकट तुम्हारे होकर भी
मैं थोड़ा घबराया माता

तंज कसा निज आत्मा ने या
चोर छिपा कोई अंतस में

शनिवार, 14 जुलाई 2018

जय-जय राधेश्याम की


॥ दोहा ॥
व्याप्त रहो मुझमें सदा, बंसीधर, घनश्याम
मेरे कर्मों से तुम्हीं, झलको आठों याम

॥ हरिगीतिका ॥
तुम सत्य हो, सामर्थ्य हो, जग के रचयिता, प्राण हो
अँधियार में सम सूर्य जन-जन को दिलाते त्राण हो
बन चेतना मन में विचरते, भाव बनते काव्य में
इतिहास में रहते सुवासित, प्रकटते संभाव्य में

मुरली मधुर मनभावनी है, पावनी है, नेह है
सुध-बुध भुला सम्मोहिता सी नृत्य करती देह है

माँ गंगा आशीष दे


॥ दोहा ॥
अमृत तेरा नीर है, स्वर्गलोक का द्वार।
माँ गंगा आशीष दे, भवसागर हो पार॥


॥ हरिगीतिका ॥

गंगा दशहरा पर्व पावन भक्ति का, विश्वास का।
श्रद्धा, समर्पण, प्रेम, निश्छल स्नेहमय उल्लास का।
इस दिन हुईं अवतरित गंगा माँ धरा पर स्वर्ग से।
जग को कराने मुक्त तम औ' पाप के संसर्ग से॥

हम पूजते हैं आज उनको शुद्ध अंतर, भाव से।
है पुण्यदायी निर्धनों को दान दें सदभाव से।