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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

मुकदमा (अतुकांत)

मुकदमा "मैं" बनाम "हम" का
अंतस की अदालत में
दायर हो गया था
बचपन की विदाई के साथ ही

"मैं" की बढ़त ताकत देती है पंखों को
"हम" की प्रबलता ले लेती कुछ अंश
अंबर के लिए कर के रूप में
अंबर को मना भी नहीं कर सकते!

कितने ही खनकते पल
खर्च होते गये इस विवाद में अब तक
अनिर्णय का अट्टहास डरा रहा है
पाँवों के छालों का दायरा बढ़ा रहा है

शनिवार, 21 जुलाई 2018

ढूँढ लिया है अपना सूरज

तुम बने हुए हो श्वेत कबूतर शांति के प्रतीक वाले
अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है
लेकिन आकाश कहाँ है तुम्हारा? और कैसा है?
कभी पूछा भी है उसका हाल तुमने?
या जबरन फड़फड़ाते हो पंख कहीं-कहीं दिखाने के लिये!
अपनी राजनीति चमकाने के लिये!

बुधवार, 18 जुलाई 2018

मूल्य समर्पण का

जब-जब तुम करीब लगे
अहसास कराया है दूरियों ने भी
अपनी मौजूदगी का
दायरों ने दिखाई है धमक
ठठाकर हँसी हैं वर्जनाएँ
अभिशप्त से विवश
वापस लौट गये भाव

वो अजनबी तलाश

बावले नैन
दौड़ते दरवाजे की ओर बार-बार
किसका इंतजार
न कोई चिठ्ठी आयी न ही संदेश
कोई दस्तक भी तो नहीं हुई
फिर भी एक आवारगी है
घनी आबादी के किनारे
एक बियाबान सा इलाका

मेरे प्यारे बादल

आशा न थी
जिस बादल से पानी मिलता था
उससे तेजाब बरस गया
सो फट पड़ा ज्वालामुखी
बह गया
हैरानी और आँसू मिश्रित लावा
अब
अंदर घर कर चुकी है

मैं दर्पण ही तो हूँ तुम्हारा

मैं दर्पण ही तो हूँ तुम्हारा
सँवारा है नित्य तुमको विभिन्न कोणों से
तुममें साकार होना मैंने स्वीकार लिया
किन्तु तुमने?
तुमने सदैव समझा मुझे वस्तु उपभोग की
बदलने को भी आतुर रहे क्षण-क्षण

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

क्षणिकाएं

1.
नीला आकाश अपनी आभा से
सजा देता है रंगहीन नीर को
स्पर्श किए बिना
व्याप्त हो जाती है जिससे सागर में भी
एक दिव्य सी नीलिमा

मिठास रिश्तों की

अरे! कहाँ गई!
अभी तो यहीं थी!
लगता है कहीं गिर ही गई
इस आपाधापी में

हो सकता है कुचल दी गई होगी
किन्हीं कदमों के तले
या फिर उड़ा ले गया उसे
झोंका कोई हवा का
चाहे चुरा ले गया होगा चोर कोई,
लेकिन चुराएगा कौन!

वो बच्चा...

वो बच्चा बीनता कचरा
कूड़े के ढेर से, लादे पीठ पर बोरी
फटी निकर में, बदन उघारे
सूखे-भूरे बाल, बेतरतीब
रुखी त्वचा सनी धूल-मिटटी से

पतली उँगलियाँ, निकला पेट
भिनभिनाती मक्खियाँ
घूमते आवारा कुत्ते

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

अखंड आस (अतुकांत)

रुग्ण एस्बेस्टस तले
टिमटिमा रही है 
अखंड आस
दरकी दीवार के सहारे

संघर्ष 
फड़काता भुजाएँ
पीकर आँसू
फर्श के चटकते प्लास्टर का
बलवान हुआ जाता
उन हवाओं की गंध से
जिनमें होती है चीत्कार पास के जंगल की
जो खाया जा रहा "सभ्य लोगों" के द्वारा

रंग-बिरंगे झंडों ने
भड़काया बारूद बनने के लिए
थालों में सजा-सजाकर लाए गए हथियार
लेकिन