सुधाकर सर अपने निजी कोचिंग संस्थान में छात्रों
के साथ व्यस्त थे कि मोबाइल बज उठा. देखा तो पत्नी रीमा का फोन आ रहा था. क्लास से
बाहर आकर रिसीव किया,
“हाँ बोलो रीमा...”
“अरे आज जल्दी लौटिए थोड़ा...” रीमा की आवाज में
उत्साह था.
“काहे भई?” सुधाकर ने जानना चाहा.
“वो मधु अपनी मम्मी के साथ आने वाली है अभी थोड़ी
देर में...” कहते-कहते रीमा बच्चों सी किलक उठी. सुधाकर सर को हँसी आ गयी. मधु
उनके बेटे साहिल की दोस्त थी और दोनों में खूब निभती थी. इसके अलावा मधु का
सीधा-सरल तथा व्यवहारकुशल स्वभाव सुधाकर और उनके परिवार के बाकी लोगों को भी बहुत
पसंद आता था. हमेशा सोचते कि काश इसके ही जैसी लड़की हमारी बहू बनती! मधु के अपनी
मम्मी को साथ लाने की बात सुनकर उसके पीछे छिपी संभावना को भाँप भीतर-भीतर वे भी
खुश तो बहुत हुए लेकिन रीमा को छेड़ने के उद्देश्य से बोले,
“अरे तो सम्हाल लेना न तुम! आज नया बैच शुरू हुआ
है, उसको देखना जरूरी मुझे!”