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शुक्रवार, 12 मार्च 2021

सेनानी का वंश (लघुकथा) | laghukatha in hindi | Hindi short stories

 

पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार राजेश आज मेरे घर आया हुआ था और मैं उसे उसके प्रस्तावित लघु उद्योग हेतु ऋण प्रक्रिया के विषय में समझा रहा था। एक पड़ोसी और बैंककर्मी होने के नाते यह मेरा नैतिक और व्यावसायिक दायित्व भी था। बहुत छोटा सा जेनरल स्टोर चलाने वाले राजेश की बढ़ती पारिवारिक आवश्यकताएँ उसे नये क्षेत्रों में प्रयास करने के लिए विवश कर रही थीं। उसे लगभग पच्चीस हजार रुपये का लोन चाहिए था।

 

पूरी प्रक्रिया को समझ के राजेश जब जाने को उठा तो यकायक मुझे हमारे संसदीय क्षेत्र के सांसद महोदय द्वारा इस गणतंत्र दिवस पर राजेश के दिवंगत दादा, जो कि स्वतंत्रता सेनानी थे, को मरणोपरांत सम्मान स्वरूप दी जानेवाली इक्कीस हजार रुपये की घोषणा का स्मरण हुआ। मैंने उसे टोका,

 

"अरे राजेश, तुमको तो अभी इस छब्बीस जनवरी पर इक्कीस हजार रुपये बैठे-बिठाए मिलने वाले! लोन के चक्कर में क्यों हो?"

 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

मरूद्यान (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

खिड़की पास चुपचाप खड़े मधुकर बाबू अपने पड़ोसी लड़के अरिजीत को दफ्तर के लिए निकलते हुए देख रहे थे। पिता की सेवाकाल में हुई मृत्यु के बाद अनुकम्पा के आधार पर उसे नौकरी मिल गयी थी। अपने रिटायरमेंट से मात्र छः महीने दूर थे मधुकर बाबू। उनके मन में नकारात्मक भावों ने फिर चीखना शुरू कर दिया - काश, मैं भी मर जाता! मेरे बेटे विवेक को भी ऐसे ही नौकरी मिल जाती! बच्चा दिन-रात मेहनत करता है लेकिन ये आज की गलाकाट प्रतियोगिता...ओह्ह! उसका ये दुखी चेहरा अब और देखा नहीं जाता।

मन मसोसते वे कमरे से बाहर निकले। बरामदे के निकट पहुँचने पर उन्हें विवेक और उसके दोस्त उत्पल की बातचीत सुनाई दी. उत्पल कह रहा था,

“अरिजीत के तो मजे हो गये। सरकारी नौकरी मिल गयी और हम हैं कि वहीं के वहीं घिस रहे हैं...”

उसकी बात सुनकर मधुकर बाबू के मन में उमड़-घुमड़ रहा विषाद और गहरा गया। उनके भारी कदम कुछ ही आगे बढ़ पाए थे कि विवेक का झल्लाया स्वर कानों में पड़ा,

“अबे तू आदमी है कि गिद्ध? बाप के मरने पर मिली नौकरी लेकर कौन बेटा मजा कर सकता है? चूल्हे में जाए ऐसी नौकरी...इससे तो मैं बेरोजगार ही ठीक हूँ”

मधुकर बाबू परदे की ओट से विवेक को देखते ही रह गये। उनकी आशाओं को नवजीवन मिल चुका था।(समाप्त)

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

प्यार नहीं खोना (कहानी) | Love Story | Pyar nahi khona

सुधाकर सर अपने निजी कोचिंग संस्थान में छात्रों के साथ व्यस्त थे कि मोबाइल बज उठा. देखा तो पत्नी रीमा का फोन आ रहा था. क्लास से बाहर आकर रिसीव किया,

“हाँ बोलो रीमा...”

“अरे आज जल्दी लौटिए थोड़ा...” रीमा की आवाज में उत्साह था.

“काहे भई?” सुधाकर ने जानना चाहा.

“वो मधु अपनी मम्मी के साथ आने वाली है अभी थोड़ी देर में...” कहते-कहते रीमा बच्चों सी किलक उठी. सुधाकर सर को हँसी आ गयी. मधु उनके बेटे साहिल की दोस्त थी और दोनों में खूब निभती थी. इसके अलावा मधु का सीधा-सरल तथा व्यवहारकुशल स्वभाव सुधाकर और उनके परिवार के बाकी लोगों को भी बहुत पसंद आता था. हमेशा सोचते कि काश इसके ही जैसी लड़की हमारी बहू बनती! मधु के अपनी मम्मी को साथ लाने की बात सुनकर उसके पीछे छिपी संभावना को भाँप भीतर-भीतर वे भी खुश तो बहुत हुए लेकिन रीमा को छेड़ने के उद्देश्य से बोले,

“अरे तो सम्हाल लेना न तुम! आज नया बैच शुरू हुआ है, उसको देखना जरूरी मुझे!”

रविवार, 9 दिसंबर 2018

मकड़े के भाई (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

सिरसा चाय बनाने में मगन था। बड़ा लड़का मिन्टू तिरपाल की टूटी रस्सी वापस बाँध रहा था। तभी पुलिस की जीप आकर रुकी। दरोगा जी कड़कते हुए बोले

"बार-बार सालों को हटाओ लेकिन फिर लगा लेते टीन-टप्पर"

पुलिसवालों को देखते ही वहाँ बैठे दो-चार ग्राहक भी जल्दी से खिसक लिए। कुछ ही देर में अतिक्रमण हटाओ अभियान पूरा हो गया। पुलिस के जाने के बाद सिरसा और आसपास के उजाड़े गये अन्य दुकानदारों ने अपना-अपना ठीक हालत में बचा-खुचा सामान समेटना शुरू कर दिया। मिन्टू भी एक बोरा थामे खड़ा था। एक-एक कर सामान उसमें रखते सिरसा के चेहरे पर दीनता से भरी मुस्कान नाच उठी।

हीन (लघुकथा) | laghukatha in hindi | laghukatha

"भाभी, निकलता हूँ अब, शाम को सरला आ जाएगी आपकी मदद के लिए"

आटे की थैली अपने बड़े भाई मोहन की रसोई में रखते हुए मदन ने उसकी बीवी से कहा और बाहर को चल पड़ा। पीछे से भाभी की आवाज सुनाई दे रही थी,

"अच्छा नहीं लगता भैया सरला को कुछ काम देते लेकिन अब मुझसे होता नहीं भारी काम..."

मदन जानता था कि ये सब बस कहने की बातें। नगरपालिका के चतुर्थवर्गीय कर्मचारी मदन की हैसियत अपने राजपत्रित अधिकारी भाई के घर में एक नौकर से कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी। वह तो अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति की विवशता थी जो बार-बार मदन को यहाँ ले आती।

बाहर निकलने पर उसकी नजर अपने भाई मोहन पर गयी। मोबाइल पर आँखें जमाए मोहन बाबू ने उसकी ओर देखना भी जरूरी नहीं समझा। हमेशा की तरह मदन फिर हीनता के भाव से दबने लगा। तभी उसका बेटा अनिल वहाँ आया और कुछ पैसे देता हुआ बोला,