गजल क्या है, गजल कैसे लिखी जाती है, गजल में मात्रा कैसे गिनते हैं, जैसे सवाल बहुत से आम लोगों और नये रचनाकारों के मन में भी आते रहते हैं। कई ब्लॉगर ऐसे हैं जिन्होंने रिटायर होने के बाद अपने विचारों को शब्द देना शुरू किया है। कई गृहिणियाँ भी हैं जो कि बच्चों के विवाह, कैरियर जैसी जिम्मेदारियाँ पूरी कर के लेखन का अपना शौक ब्लॉगिंग के माध्यम से पूरा करने आती हैं। ऐसे में अक्सर देखा गया है कि उनकी इच्छा विभिन्न विधाओं को सीखने-समझने की होती है मगर सही मंच नहीं मिल पाता। ये भी होता है कि जो आलेख इन विधाओं के उपलब्ध होते हैं, वे कठिन भाषाशैली में होने के कारण नवांकुरों के मन में घुल नहीं पाते। इसलिए मेरा प्रयास अपने इस ब्लॉग पर यही रहता है कि सरल से सरल भाषा में उन लोगों के लिए छंद, कविता, समेत अलग-अलग विधाओं पर यथासंभव चर्चा करूँ। इसी क्रम में आज बात करेंगे गजल की। जो भी वरिष्ठ जानकार इस आलेख को पढ़ें, उनसे मेरा निवेदन यही है कि इसको एकदम नये रचनाकारों को आरंभिक जानकारी देने के उद्देश्य से बनाया गया ही मानें। इसको अपनी स्केल पर नाप कर कृपया किसी भी नवोदित को हतोत्साहित न करें।
जो लोग गजल लिखना चाहते हैं, उनका स्वागत है। गजल के बारे में बेसिक बातें जान लीजिए।
- कोई भी गजल, शे'रों का समूह होती है। एक गजल में कम से कम पाँच और अधिक से अधिक ग्यारह शे'र होते हैं।
- सबसे पहला शे'र "मतला" और अंतिम शे'र, जिसमें गजलकार का नाम शामिल हो, "मकता" कहलाता है।
- मतले के शे'र की दोनों पंक्तियाँ (मिसरे), तुकांत होती हैं। इसके बाद अगर किसी और शे'र के साथ ऐसा नहीं किया जाता। हाँ, अगर एक से ज्यादा मतले हों तो बात और है।
- गजल के सारे शे'र किसी एक विषय के भी हो सकते हैं अथवा हरेक शे'र अपने स्वतंत्र विषय का भी हो सकता है।
- एक ही विषय के शे'र वाली गजल, मुसलसल गजल और अलग-अलग भाव के शे'र वाली गजल गैर मुसलसल गजल कहलाती है।
